Monday, July 31, 2017

लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 2 (सराहन, सांगला, चितकुल )

नारकंडा से हम सुबह दस के करीब ,सराहन  की तरफ चले .रास्ता बहुत ही खूबसूरत  था ,पतली घुमावदार सडकें, ढेर सारी हरियाली के बीच सेब के बाग़ . मैंने पहली बार पेड़ों पर लगे सेब को देखा . सेब के पेड़ तो देखे थे पर सेबों के मौसम में कभी हिमाचल आना नहीं हुआ था . गुच्छे में लटके लाल लाल सेबों को देखकर  मैं तो जैसे पागल हुई जा रही थी. एक जगह मैंने गाड़ी रुकवाई और फोटो खींचने के लिए उतर पड़ी. मेरा उत्साह देख सब डर गए कि मैं कोई सेब तोड़ ना लूँ, पर बिना पूछे कैसे हाथ लगा सकती थी .अक्ल घर थोड़े ही भूल आई थी, साथ लेकर चल रही थी :)  .लिहाजा पेड़ों के सामने ढेर सारे फोटो खिंचवाए .कई जगह  सतलज नदी भी संग संग चली और उसका कल कल करता  मधुर स्वर...सफर को संगीतमय बना रहा था . तीन बजे के करीब हमलोग सराहन पहुँच गए .
सराहन हिमाचल का एक छोटा सा गाँव है .इसे किन्नौर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. यह शिमला से १६५ और नारकंडा से  100 किलोमीटर की दूरी पर   समुद्र तल से लगभग 7100 फुट की उंचाई पर स्थित है. पहले यह 'बुशहर रियासत 'की  राजधानी था .शायद कठिन भोगोलिक परिस्थितिओं को देखते हुए बाद में राजा राम सिंह ने रामपुर को बुशहर की राजधानी के रूप में विकसित किया और अंतिम राजा के रूप में श्री वीरभद्र सिंह जी ने इसका प्रतिनिधित्व किया.  हिमाचल के लोग उन्हें आज भी राजा साहब कह कर बुलाना पसंद करते हैं.
सराहन के बारे में एक पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान कभी शोणितपुर कहलाता था. और यहाँ का सम्राट बाणासुर था, जो राजा बलि का पुत्र था. वह भगवान् भोले शंकर का परम भक्त था. “ त्रेता युग में रावण और बाणासुर के बीच में काफी संघर्ष होता रहा है, उस वक़्त बाणासुर ही एक अकेला ऐसा योधा था, जिससे रावण कभी जीत नहीं सका”. 


होटल में सामान रख कर खाना खाया और यूँ ही भटकने निकल गए . एक छोटे कस्बे के बाज़ार सा था जहां जरूरत की सारी चीज़ें मिल रही थीं .स्कूल  यूनिफ़ॉर्म में बच्चे स्कूल से लौट रहे थे . स्कोल कि इमारत भी बड़ी सी थी. कुछ बच्चों से रोक कर स्कूल के विषय में बात की तो पता चला, अच्छी पढ़ाई होती है और  सारे विषयों के शिक्षक भी हैं . छोटे से कस्बे के हिसाब से अच्छी खबर थी. हिमाचल में शिक्षा  का स्तर अच्छा दिखा और जितने भी लोगों से मिली , स्त्री-पुरुष, सभी बारहवीं  पास जरूर थे .
दूसरे दिन सुबह तैयार हो हम भीमकाली मंदिर देखने निकल पड़े.
सराहन का भीमाकाली मंदिर बहुत प्रसिद्ध है. दूर दूर से लोग भीमा देवी के दर्शन करने आते हैं और मन्नतें माँगते हैं . 'बुशहर राजवंश' की ये कुलदेवी हैं .आज भी विजयादशमी के समय वीरभद्र सिंह यहाँ पूजा करने आते हैं. यह मंदिर राजाओं के महल के अंदर स्थापित था और उनका निजी मंदिर था पर अब यहाँ सार्वजनिक स्थान है. यह मंदिर सब तरफ से सेबों के बाग़ से घिरा हुआ  है.पर्वत शिखर श्रीखंड की  पृष्ठभूमि में यह बहुत ही मनमोहक लगता है. 
यह ५१ शक्तिपीठों में से एक है .कहते हैं शिव जी जब सती का शव कंधे पर लेकर तांडव नृत्य कर रहे थे तो सती का कान यहाँ गिरा था और भीमाकाली देवी प्रगट हुई थीं. मन्दिर के  दो भव्य भवन है . एक का जीर्णोद्धार  किया गया है और एक अपेक्षाकृत नया है. 
 हिंदू और बौद्ध वास्तुशिल्प से निर्मित यह मंदिर लगभग 2,000 वर्ष पुराना है, मगर इसका जीर्णोद्धार कर इसको पुनः वही आकार दिया गया है। पत्थरों और लकड़ी के इस्तेमाल से बना यह मंदिर शत-प्रतिशत भूकंपरोधी है। मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर आप हिमालय को साक्षात निहार सकते हैं।  यह मंदिर अपनी विशिष्ट निर्माण शैली, लकड़ी की कलात्मक नक्काशी, और चांदी  चढ़े दरवाजों के लिए विख्यात है. उलटे पिरामिड की शक्ल में बने इस मन्दिर का नीचे बना आधार छोटा है, पहली मंजिल बड़ी और दूसरी मंजिल पहले से भी बड़ी है.,जिसके ऊपर छत्र है . मुख्य मन्दिर भी दुरी मंजिल पर ही है. मन्दिर निर्माण की एक और विशिष्टता यह है कि यहाँ लकड़ी के स्लीपर तथा पत्त्थर की  सिलें एक एक ऊपर एक रखकर मुख्य दीवारें  बनाई गई है. ये दीवारें और ढलवां छत बौद्ध प्रभाव को दर्शाती हैं. निर्माण की इस विशिष्टता के कारण यह गर्मी सर्दी आसानी से शसन कर लेती हैं. अनुमानतः यह सातवीं, आठवीं, शताब्दी में बना था .. इस से पता चलता है कि उस समय तिब्बत के साथ भारत का व्यापार शुरू हो चुका था . लकड़ी और पत्थर से बनी दीवारें हैं और छत काफी नीची है. 
  

मन्दिर का बाहरी दृश्य भी  मंत्रमुग्ध कर देने वाला है. यह मन्दिर बहुत बड़े भाग में फैला हुआ है. मुख्य मन्दिर तक जाने में बड़े बड़े तीन आंगन पार करने पड़ते हैं .जहां देवी शक्ति के तीन अलग अलग रूपों की मूर्ति मन्दिर में स्थापित है. देवी भीमा की अष्टधातु से बनी अष्टभुजा वाली मूर्ति सबसे ऊपर वाले प्रांगण में है. पैगोडा आकार के छत वाली इस मंदिर में पहाड़ी शिल्पकारी के बहुत सुंदर नमूने देखने को मिलते हैं.दीवारों पर लकड़ी के ऊपर देवी देवताओं, फूल पत्तीकी सुंदर नक्काशी है. मंदिर के प्रांगण में जाने वाले बड़े बड़े दरवाजों से गुजरना होता है उनपर चांदी मढ़ी हुई थी . 
मंदिर के अंदर स्त्री या पुरुष बिना सर ढके नहीं जा सकते .गार्ड उन्हें एक हिमाचली टोपी पहनने के लिए देता है. चमड़े की  बनी कोई वस्तु बेल्ट या पर्स भी लेकर नहीं जा सकते . इन्हें रखने के लिए बाहर लॉकर बने हुए हैं. हैरानी की बात ये लगी कि लॉकर के पास ही ,ताले चाबी भी रखे थे . लॉकर में अपना समान रखो और ताला लगाकर चाबी जेब में डाल कर ले जाओ. कहने में शर्म आ रही है पर अपना उत्तर भारत होता तो ताले-चाबी कब के चोरी हो गए होते . यहाँ ट्रेन के टॉयलेट में मग और बैंक,ऑफिस  वगैरह में पेन भी जंजीर में बंधी होती है :( 
पुरानी मन्दिर वाले प्रांगण में बहुत बड़े घड़े और कडाही पर्यटकों के दर्शनार्थ रखे गए हैं. हमने भी उनके संग कुछ  फोटो खिंचवाए .
सराहन का पक्षी विहार भी मशहूर है.हम वहाँ गए भी पर पता चला आजकल बंद है वह पक्षियों का प्रजनन काल है, उस वक्त पर्यटकों की आवाजाही से वे डिस्टर्ब  हो सकते हैं.. सही है,पक्षी हैं तो क्या,उन्हें भी आराम और  प्राइवेसी चाहिए ही. . वहीँ पर कुछ खूबसूरत मजदूर औरतें किसी भवन निर्माण में काम कर रही थीं और सुस्ताने के लिए रेत पर बैठी थीं. मुझे इतनी प्यारी लगीं कि मैंने उनकी तस्वीर ले ली .
सराहन में कई बौद्ध मठ भी हैं . एक मठ के प्रांगण में गए तो पाया, मठ बंद था .पर वहां मेरे मन  की मुराद पूरी हो गई. मठ कुछ उंचाई पर था उस से लगा हुआ कुछ नीचे एक सेब का बाग़ था .सेब से लदे डाल,मठ के प्रांगण में झूल रहे थे .पहले तो मैंने उन्हें तोड़ने की एक्टिंग करती  हुई तस्वीरें खिंचवाई. वहीँ दो तीन औरतें बैठी हुई थीं .वे मेरा कौतूहल  देख ,मुस्करा रही थीं.पता चला उनका ही बाग़ है और मैंने उनसे आग्रह किया, 'एक सेब तोड़ लूँ '.उन्होंने हंसते हुए इजाज़त दे दी...'एक क्या दो चार तोड़ लो'.पर मैंने दो ही तोड़े  .सेब अभी खट्टे ही थे पर इतने रसभरे और क्रंची कि मजा आ गया.

एक बहुत ही भव्य मठ एक पहाड़ी  के ऊपर बना हुआ था .वहाँ बुद्ध की विशालकाय मूर्ति थी .ऊपर से देखने से धुंध में लिपटा पूरा सराहन दिख रहा था . एक बौद्ध भिक्षु ने कतार से चमचमाते दीयों में दिया और बत्ती सजा रखी थी. पीतल के कई दीप स्तम्भ भी थे, जो सब चमचमा रहे थे . निश्चय ही वो बौद्ध  भिक्षु बहुत ही श्रद्धा लगन से अपना काम करता था . मठ के नीचे एक सेब का पेड़ दिख रहा था , जो फलों से इतना ज्यादा लदा हुआ   था कि उसकी पत्तियाँ भी नजर नहीं आ रही थीं. लौटते हुए हमें पानी बहने का स्वर तो सुनाई दे रहा था पर कहीं कोई धारा दिखाई नहीं दे रही थी....आवाज़ का पीछा करते रहे तो पाया...पत्थरों के नीचे से एक पतला सा झरना बह रहा था .इतनी बड़ी बड़ी शिलाएं भी उसकी आवाज़ नहीं दबा पा रही थीं ( हम स्त्रियों की आवाज़ सी :) ) 


अब शाम होने को आई थी...हम होटल लौट आये .दुसरे दिन सांगला के लिए प्रस्थान करना था .
'सांगला' हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित एक सुरम्य पहाड़ी शहर है। भारत-चीन सीमा पर अपनी स्थिति की वजह से 1989 तक इस स्थान के दौरे के लिये, यात्रियों को भारत सरकार से एक विशेष अनुमति लेनी पड़ती थी। हालांकि, बाद में इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये इस नियम को समाप्त कर दिया गया। बस्पा नदी की घाटी में स्थित यह जगह तिब्बती सीमा से काफी निकट है।तिब्बती भाषा में 'सांगला काअर्थ है 'प्रकाश का रास्ता'। इसकी  की प्राकृतिक सुंदरता अद्भुत  है चारों तरफ हिमालय की उंची पहाड़ियों से घिरा और वन, ढलानों और पहाड़ों से छाया हुआ है।यहाँ सेब, खुबानी, अखरोट, देवदार के वृक्ष बहुतायत में हैं. बताया जाता है कि प्राचीन समय में यह घाटी वनों और प्राकृतिक सम्पदा से इतनी ज्यदा घनी थी कि अग्यात्वास के दौरान ,पांडव यहीं छुपे  थे .  
इन पहाड़ी रास्तों पर कहीं कोई होटल या ढाबा नहीं मिलता कि रुक कर कुछ खाया पिया जाए. हमें बेतहाशा भूख लग गई थी. जब होटल पहुंच कर खाना ऑर्डर करने के लिए बुलाया तो उसने पूछा, 'आप जो कहें वही बना देंगे , हमें सामान लाने बाज़ार  जाना होगा.' .अगस्त का महीना वहाँ घुमने के लिए बहुत मुफीद मौसम है पर पर्यटकों के लिए ऑफ सीजन है. पर्यटक, गर्मी या दशहरे की छुट्टियों में ही ज्यादातर आते हैं. 
 खाना तैयार होने में वक्त लगने वाला था . हमने कहा, 'हम बाज़ार में जाकर ही कुछ खा लेते हैं, अब आप शाम  को खाना बनाना' . होटल का कुक भी हमारे साथ ही बाज़ार आया .वहाँ एक रस्टोरेंट में दाल रोटी और सब्जी आर्डर की  सब्जी का स्वाद कुछ अजीब सा था , चाइनीज़ जैसा पर पूरी तरह वैसा भी नहीं .लेकिन हमें इतनी भूख लगी थी कि गर्म गर्म फुलके के साथ वो सब्जी भी स्वादिष्ट लगी . पास की टेबल पर एक कपल बैठा था . वो हमारे होटल में नहीं ठहरा  पर शायद  उनके होटल में भी खाना नहीं बना था. वे लोग भी दाल रोटी सब्जी खा रहे थे .वहाँ वाशबेसिन पर गजब जुगाड़ दिखा. एक बड़े से प्लास्टिक डब्बे में नल लगा हुआ  था और वही डब्बा वाश बेसिन के ऊपर टंगा था . 
होटल में पहुंचे तो पीछे की तरफ एक अद्भुत दृश्य दिखा . हमारे होटल और पहाड़ियों के बीच एक इन्द्र्धनुष तना हुआ था . इतने करीब से इन्द्रधनुष पहली बार देख रही थी, हमने इन्द्रधनुष के साथ एक सेल्फी  ले ली :) खिड़की से दिखता दृश्य बचपन में बनाई पेंटिंग सरीखा लग रहा था .बर्फ से लदी चोटिया ,पहाड़ों के ढलान पर देवदार के वृक्ष ,उसके ऊपर मखमल सा बिछा हरा चारागाह और नीचे बहती बलखाती चंचल  नदी ...नदी के किनारे फलों से लदे सेब के बाग़ .नदी की कलकल धरा का मधुर संगीत हमें यहान तक सुनाई दे रहा था .बहुत देर तक  हम उन दृश्यों में खोये रहे . फिर ख्याल आया नदी तक घूम आया जाए .   नदी के किनारे ढलान पर एक गाँव बसा हुआ था . हम पूछते पाछते चल दिए ,.रास्ते में कई महिलायें पत्तों का बड़ा सा बोझा लादे ,घर की तरफ लौट रही थीं. . वे सर्दी के मौसम के लिए पशुओं का चारा इकठा करके रख  रही थीं.लाल लाल गालों वाली सुंदर पतली छरहरी महिलायें ,तेजी से इधर उधर काम से आ जा रही थीं. एक से रुक  र्मैने कुछ बात की तो वो पूछने लगी, कहाँ से आई हैं? और बम्बई कहने पर उसकी आँखें चमक उठीं, फिर उसने पूछा, '...कैसा लगा हमारा देस?" मेरे  'बहुत अच्छा ' कहने पर मुस्करा कर बड़ी मीठी आवाज़ में बोली, ;"फिर आना' . अनजान लोगों को भी अपने देस फिर फिर आने का न्योता, ये पहाड़ों के निश्छल लोग ही दे सकते हैं. 
थोडा नीचे जाने पर ,नाग देवता का बहुत सुंदर मन्दिर मिला . उसके द्वार पर बड़े बड़े नागों की आकृति बनी हुई थी. वहाँ लिखा था ,'पारम्परिक वेशभूष में ही मंदिर के अंदर प्रवेश करें' .वैसे भी मंदिर बंद था . उस प्रांगण में ऐसे चार मंदिर थे ....कुछ लड़के लडकियाँ ,मन्दिर के प्रांगण में इक्खट दुक्खट खेल रहे थे . पूरे देश में ही लडकियां इसे खेलती हैं . खेलने के लिए बस थोड़ी सी जगह और एक पत्थर का टुकड़ा ही  तो चाहिए . शाम गहराने लगी थी , होटल से इतनी पास  दिखती नदी अब भी दूर नजर आ रही थी. और हम सोच रहे थे, जितना नीचे उतरते जायेंगे, वापस चढना भी पड़ेगा.सो लौट पड़े. एक छोटी सी दूकान में चाय पी और समोसे को याद करते  हुए मोमोज खाए .यहाँ समोसे चाट पकौड़ी की जगह बस मोमोज ही मिलते थे, जो मुझे नहीं पसंद :( (नॉनवेज खाने  वाले कहते हैं , वेज मोमोज अच्छेनहीं होते, नौन्वेज ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं , अब  अहम शाकाहारियों को ये कैसे पता चलेगा )
दूसरे दिन हमें भारत-तिब्बत  की सीमा पर बसे अंतिम गाँव 'चिट्कुल' के लिए निकलना था. चितकुल बस्पा नदी के किनारे बसा बहुत ही खूबसूरत छोटा सा गाँव है. सांगला से २८ किलोमीटर की दूरी पर है. सांगला से चितकुल का रास्ता इतना खूबसूरत है कि आज भी आँखें बंद करती हूँ तो सारे दृश्य साकार हो उठते हैं. यह पूरा रास्ता फैले हुए जंगल के बीच से होकर गुजरता है.रास्ते के ,पार्श्व में बहती बसपा नदी...पिघलते ग्लेशियर की छोटी छोटी धाराएं, आस-पास पड़े बड़े बड़े सफेद गोल पत्थर, तरह तरह के घने हरे पेड़, दूर चमकती बर्फीली चोटियाँ रास्ते को नयनाभिराम बना देती हैं.  महसूस होता है , स्वर्ग अगर कहीं है तो ऐसा ही होगा..हर तरफ हरियाली से भरा यह क्षेत्र ,भोजपत्र के घने जंगलों के लिए विख्यात है. कभी भोजपत्र का उपयोग कागज़ की तरह किया जाता था ,हमारे ऋषि मुनियों ने भोजपत्र पर ही कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है. भोजपत्र, टिम्बरलाइन (समुद्रतल से ३३०० मीटर की ऊँचाई ) से ऊपर उगने वाल दुर्लभ वृक्षों में से एक है. इसका जंगल हज़ारों वर्षों में पनपता है. 
बीच में एक पुल पार करना पड़ा और हम पुल से उतरकर नदी तक जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए . दूर से बहती हुई, पत्थरों से टकराती नदी की धारा बहुत तेज थी .एक पत्थर पर बैठ जैसे ही धारा में पैर डाला तो अगले ही पल निकाल लेना पड़ा...लगा पैर सुन्न हो जायेंगे...इतना बर्फीला,ठंढा पानी था .
 में लकड़ियों से बने हुए बहुत छोटे छोटे एक दुसरे से लगे हुए घर थे .बीच में एक बड़ा सा नाला बह रहा था .उस नाले का पानी इतना साफ़ था कि मैंने उसकी भी एक तस्वीर ले ली .गाँव  के किनारे खेतों में सरसों भी फूली हुई थी और एक पति पत्नी मिलकर खेत में कम कर रहे थे . एक घर के बाहर चटाइयों पर शलजम, गोभी सूख रहे थे .वहीँ एक बूढ़े सज्जन बैठे थे .पूछने पर बताया कि ये इंतजाम सर्दियों के लिए है. सर्दियों में इनका ही सूप बनाकर पीते हैं. गाँव के बीच में थोड़ी सी खाली जगह पर पड़ी एक लाल बेंच बहुत खूबसूरत लग रही थी . मन हुआ देर तक वहाँ बैठी रह जाऊं. चितकुल में आलू के बहुत उत्कृष्ट किस्म की अच्छी खेती होती है . दुनिया भर में यहाँ के आलू मशहूर हैं,क्योंकि यहां उगाये आलू को दुनिया में सबसे अच्छा माना जाता है और यह काफी महंगा भी है।

यहाँ एक स्थानीय देवी चिटकुल माथी का सुंदर मंदिर है, जो गांव के मूल निवासियों द्वारा माता देवी के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू देवी गंगोत्री को समर्पित है,  .पर दोपहर के वक्त मंदिर बंद था ,हमने बाहर से ही दर्शन कर लिए. यहाँ बौद्ध मठ भी हैं .
वहाँ एक वॉलीबॉल कोर्ट भी था , जहां कुछ युवा  वॉलीबॉल खेल रहे थे .पास ही बहुत सारे बुजुर्ग, बैठे कोई मीटिंग कर रहे थे . चिट्कुल में दसवीं तक का एक स्कूल भी है और गाँव का हर कोई साक्षर है. सुदूर सीमा का अंतिम गाँव  जरूर है पर सारी आधुनिक सुविधाएं वहाँ पहुँच चुकी थी .घरों के ऊपर डिश एंटेना लगे हुए थे .पास की दूकान में पेप्सी, बिस्किट, चिप्स सब कुछ मिल रहा था .हमने भी वहाँ बैठ चिप्स के साथ अदरक इलायची वाली स्वादिष्ट चाय पी. 
उन्हीं खूबसूरत रास्तों को आँखों में भरते हम वापस हो लिए . होटल में खाना खा कर ,'कामरू किला' देखने चल पड़े.कामरू किला अब एक हिंदू देवी कामाक्षी को समर्पित मंदिर में बदल गया है. पहले यहाँ  राजा रहते थे . यह काफी ऊँची एक पहाड़ी पर स्थित है. पर सीढियां बनी हुई हैं क्यूंकि पूरे पहाड़ पर घर बने हुए हैं और लोग बसे हुए हैं . रस्ते में सेब के पेड़ भी हैं और कई जगह सीढियों पर पेड़ की डाल से मेहराब सा बना हुआ है ,जिसपर हरे-लाल सेब बन्दनवार से सजे थे . सेबों की दीवानी मैंने उनके नीचे खड़े होकर भी एक तस्वीर खिंचवा ली :) 
हम चढ़ते जा रहे थे ,पर सीढियां खत्म होने का  नाम  ही नहीं ले रही थीं. पर शिकायत करते शर्म आ रही थी क्यूंकि लगातार लोग सीढियों से ऊपर जा रहे थे . एक बहुत बूढी महिला भी सीढ़ी चढ़ रही थीं. कुछ मजदूर पीठ पर दस -पन्द्रह ईंट एक थैले में बांधकर ऊपर चढ़  रहे थे और जाने कितने फेरे लगाते होंगे वे. 
पूरी हिमाचल यात्रा के दौरान मैंने एक भी किसी स्थानीय मोटे स्त्री-पुरुष को नहीं देखा . पहाड़ों के ऊपर चढने का अभ्यास अतिरिक्त चर्बी कहाँ जमने देगा . ऊपर चढने के बाद पाया किले का विशालकाय दरवाजा बंद था और उसपर मोटा ताला जड़ा हुआ था .पर निराशा में डूबनेसे बेहतर  हमने सोचा किले के पीछे बसा गांव ही घूम आयें .कुछ युवा वहाँ बैडमिन्टन  खेल रहे थे .पूछने पर बताया कि पुजारी किसी काम से नीचे  गया होगा,थोड़ी देर में आ जाएगा .हम ऊपर ही इधर उधर घूमते रहे . कई जगह सफेद-काले-भूरे झबरीले कुत्ते पड़े सुस्ता रहे थे  .पहाड़ पर लोग कुत्तों का बहुत ख्याल रखते हैं. सारे कुत्ते बहुत हृष्ट पुष्ट थे. और अच्छी ब्रीड के लग रहे थे. थोड़ी देर बाद लौटे  तो पाया, पुजारी लौट आये थे . उन्होंने अंदर जाने से पहले एक हिमाचली टोपी पहनने के लिए दी और कमर में बाँधने के लिए एक कमरबंद सा दिया . बिना इसके किले में प्रवेश वर्जित था. जब रजिस्टर में अपना नाम लिखने की बारी आई तो पाया ऊपर के सारे नाम विदेशी थे , हॉलैंड , इंग्लैण्ड, ऑस्ट्रेलिया ,जर्मनी, इजरायल आदि से पर्यटक थे. भारतीय नाम भी होंगें जरूर पर रजिस्टर के उस पेज पर नहीं थे .हमने अंदर से किला देखा, जिसमे कभी राजा रहते थे पर अभी वो एक साधारण से घर जैसा ही  लग रहा था .लकड़ी से बने इस किले की  अवस्था बहुत जर्जर थी . अच्छी देखरेख की  सख्त जरूरत है . मंदिर वाला कमरा उसने नहीं खोला ,बताय कि वो विशेष अवसरों पर ही खुलता है. किले के प्रांगण से नीचे पूरा सांगला नजर आ रहा था .यहाँ शाम हो चुकी थी ,पर दूर पहाड़ियों पर अभी भी सूरज की रौशनी चमक रही थी....पहाड़ के नीचे का आधा हिस्सा,अँधेरे में घिरा था  और ऊपर की चोटियाँ सूरज की पीली  रौशनी में दैदीप्यमान  थीं. बहुत ही अनूठा दृश्य था .बाद में तो हर शाम यह नज़ारा देखने को मिला.
नीचे उतरना बिलकुल मुश्किल नहीं लगा . गाड़ी हमने वापस भेज दी और धीरे धीरे टहलते हुए बाज़ार का चक्कर लगाते हुए होटल लौट आये. . होटल में गर्मागर्म खाना तैयार था , बिलकुल तवे से उतारे हुए फुल्के और घर सा बिना ज्यादा तेल -मसाले का खाना. ऑफ सीजन में आने के फायदे :)
अगले दिन हमे कालापा के लिए निकलना था.


































Wednesday, July 12, 2017

बादल, बारिश एवं सखियों संग भंडारधारा की सैर

पिछले कुछ वर्षों से बारिश में सहेलियों के साथ एक पिकनिक हो ही जाती है ।पर इस बार की पिकनिक कुछ अलग थी ,पहले हमारा खाना पीना किसी रिसॉर्ट में होता था ।पर इस बार साथ में ही महाराज , रसद और बर्तन लेकर चल रहे थे ।मुम्बई से 185 किलोमीटर दूर एक हिल स्टेशन है , 'भंडारधारा ' शिरडी से बहुत पास ।वहाँ ढेर सारे छोटे बड़े झरने हैं, दो सौ साल पुराना डैम है, झील है, आस पास बिखरे बादल हैं और आँखों को सुकून पहुंचाती दूर तक फैली हरीयाली है ।

सुबह छः बजे हमलोग निकले ।जाहिर है नाश्ता रस्ते में ही करना था ।करीब आठ बजे शाहपुर के पास एक खाली जगह देख बस रुकी और महाराज ने गरमागरम उपमा और चाय बनाई ।केवल दूध में कुछ लेमन ग्रास की पत्तियां उबाल 'उकाला' भी बना ।मैंने दोनों ट्राई किये ,पर अपनी चाय ही बेहतर :)
इस बार बस में खेली गई अंत्याक्षरी भी अलग थी।एक शब्द पर अटक जाने पर एक ग्रुप ने कहा ,'मराठी गाना' चलेगा ? और फिर जहाँ हिंदी गाने याद नहीं आते वहां कन्नड़, गुजराती , तुलु में गाने गाये गए ।मैंने भी अपनी यादों के पिटारे में से 'ग' से सारे गाने खत्म हो जाने के बाद एक भोजपुरी गीत सुनाया पर थोड़ी चीटींग करके :)।'हे गंगा मईया तोहे पियरी चढ़इबो ' का हे गायब कर दिया :D ।अकेली हिंदी भाषी थी, इसलिए कोई पकड़ नहीं पाया :)।एक सत्तर से ऊपर की आंटी ने पुराने गाने गा कर अपने ग्रुप को कई बार बचाया । 'मैं बन की चिड़िया बन में बोलूं रे ' जैसे गीत कब से नहीं सुने थे। योगा क्लास की पिकनिक थी,जिसमें चौबीस से लेकर सत्तर वर्ष की महिलाएं शामिल थीं ।

भंडारधारा पहुँच कर वहां से एक गाइड साथ हो गया और गाइड के घर पर ही खाना बनाने के लिए महाराज अपने साजो सामान सहित उतर गए ।घर के पास ही एक छोटी सी लड़की कुएं की जगत पर चढ़कर पानी भरे जा रही थी ।ट्राई करने की सोची पर फिर जाने दिया ,कॉन्फिडेन्स ही नहीं था :(
बस से हम देर तक घूमते रहे ।आर्थर लेक , विल्सन डैम , नेकलेस वाटर फॉल, नैनी वाटर फॉल, रांधा वाटर फॉल , अम्ब्रेला वाटर फॉल ,रिवर्स वाटर फॉल ,अमृतेश्वर मन्दिर यहाँ के मुख्य दर्शनीय स्थल हैं ।रिवर्स वाटर फॉल में पानी तेजी से नीचे गिरता है , फिर उसकी फुहारें ऊपर की तरफ आती हैं ।

अमृतेश्वर मन्दिर में शिव लिंग पानी के अंदर ही है ।कहते हैं ,यह प्रवरा नदी का उद्गम स्त्रोत है ।कथा है कि अगस्त्य मुनि ने एक वर्ष तक इस पहाड़ पर सिर्फ हवा और पानी के सहारे तपस्या की थी और उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने गंगा की एक धारा प्रदान की जिसे प्रवरा नदी के रूप में जाना जाता है ।
घूमते हुए चार बज गए और सबका भूख से बुरा हाल था ।गाइड के घर वापसी हुई ।खपरैल की छत और मिटटी की दीवारों वाला एक साफ़ सुथरा घर था ।एक बड़े से कमरे में चटाई बिछा हमें बिठाया गया ।ईश्वर ने सोचा , हमें पूरा ही गंवई अनुभव हो और बिजली चली गई ।दो ढिबरी जलाई गई ।सब कहने लगीं, हम कैंडल लाइट लंच कर रहे हैं। तब मैंने बताया,' इसे ढिबरी कहते हैं' ।एक ने बताया ,'हमलोग इसे चिमनी कहते हैं' ।छोले ,ढोकला,गुलाब जामुन , चावल दाल और कढ़ाई से उतरती गरम गरम पूरियां ।जम कर खाने के बाद हम गांव में ही इधर उधर घूमने चले गए ।खेतों में घुटने तक रंग बिरंगी साड़ियाँ बांधे और चटाई और बोरे से बना तिकोना रेनकोट ओढ़े महिलायें धान रोप रही थीं ।एक किसान दो बैलों को हांकते कंधे पर हल रखे लौट रहा था ।एक शहरी लड़की ने उमग कर कहा , 'ए देखो बैलगाड़ी '।उसे करेक्ट किया, 'ये हल है' ।वो भी झेंप गई , बोली 'वो दो बैल देखते ही बैलगाड़ी ही ध्यान में आता है' ।ढेर सारी बकरियों को हांकते दो किशोर लड़के चले आ रहे थे ।जगह जगह छोटे छोटे बच्चे, जंगली फूल लिए बेचने के लिए खड़े थे ।पर मैं इन सबकी तस्वीर नहीं ले सकी ।कैमरा घर पर ही छूट गया था और फोन की बैटरी डाउन :(

वापसी में धुंध ,ट्रैफिक का सामना करते चाय पीने , खाने के लिए रुकते हुए, घर पहुँचने में रात के साढ़े बारह बज गए ।पर सब कुछ घर के आस पास ही तो नहीं मिलेगा ।थोड़ी कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी ।        
































Friday, June 30, 2017

लाहुल स्पीती यात्रा -- 1 (चंडीगढ़, शिमला, नारकंडा )

काफी दिनों बाद कोई ब्लॉगपोस्ट लिख रही हूँ. शुरुआत करने से पहले एक बार फिर अपने ब्लॉग पाठकों का शुक्रिया अदा कर दूँ। लेखन की दूसरी पारी ,आप सब पाठकों के उत्सावर्द्धन से ही जारी रही...कहानियाँ लिखते,उपन्यास भी छप गया। कुछ यात्रा वृत्तांत काफी दिनों से लिखना चाह रही थी ,पर टलता जा रहा था। अब ब्लॉग वापसी हुई है तो सोचा, किस्तों में वही लिख डालूँ। पढ़ने वाले होते हैं तो लिखने का भी दिल करता है। तो भूमिका ज्यादा लंबा न खींचते हुए ,ले चलती हूँ आप  सबको 'लाहुल स्पीति' की सैर पर।

मुझे पहाड़ घूमने का मन था ,पर जानी सुनी , भीड़ भरी जगहों पर नहीं। मुझे एक मित्र ने 'लाहुल स्पीति ट्रिप' सुझाया। इसके पहले मैंने यहाँ का नाम भी नहीं सुना था। फिर तो इंटरनेट खंगाला गया ,काफी कुछ पढ़ा और ग्यारह दिनों की ट्रिप प्लान कर ली।  'लाहुल स्पीती' हिमाचल प्रदेश में स्थित दो जिलों का नाम है ,जिन्हें पहाड़ों का रेगिस्तान भी कहा जाता है..करीब  15000 फीट पर स्थित यह भारत की चौथी सबसे कम आबादी वाली जगह है. यहाँ सिर्फ ऊंचे पहाड़, नदियाँ, झरने मिलने वाले थे. हमारी यात्रा के पड़ाव थे ,चंडीगढ़- नारकंडा- सराहन- सांगला- चिट्कुल-काल्पा- टाबो- काज़ा - चंद्रताल - मनाली- चंडीगढ़। हमने सब जगह होटल की बुकिंग कर दी।

मुंबई से चंडीगढ़ की सुबह की फ्लाइट थी। मुंबई की ट्रैफिक से तो सभी वाकिफ हैं। सुबह ऑफिस जाने वालों का रश भी होता है. लिहाजा हम मार्जिन लेकर चले थे फिर भी हमारे 'ओला कैब' का ड्राइवर धीमा था या उस दिन ट्रैफिक ही ज्यादा थी पता नहीं. पर हम बहुत लेट हो गए. बोर्डिंग बंद हो चुकी थी। जेट एयरवेज के कर्मचारी किसी तरह भी नहीं मान रहे थे। जब हमने काफी रिक्वेस्ट की तो उस लड़की ने अपने किसी सीनियर से बात कर कहा कि 'आपलोग जा सकते हैं पर आपका सामान नहीं जा पायेगा।  कोई छोड़ने आया है तो उनके हाथ घर भिजवा दीजिये।' कितनी अजीब सी बात है, बिना सामान हम कैसे जाते। फिर थोड़ा मक्खन लगाया तो उसने कहा, 'अच्छा दोपहर की फ्लाइट से भेज देंगे।' किसी के कुछ कहने से पहले ही मैंने हामी भर दी। चंडीगढ़ से हमें तुरंत ही निकल जाना था और शिमला होते हुए 182  किलोमीटर की दूरी तय करते हुए 'नारकंडा' पहुंचना था। दोपहर को निकलते तो मुश्किल होती पर और कोई चारा ही  नहीं था। उस लड़की ने एक दूसरे कर्मचारी को बुलाया और हमें उसके सुपुर्द कर दिया। वो लड़का हमें दौड़ाते हुए बिना किसी क्यू में लगे,सिक्योरिटी चेक करवा बाहर तक ले गया। वहाँ उसने जेट एयरवेज़ के एक सूमो को इशारे से बुलाया और एयरक्राफ्ट तक ले जाने के लिए कहा. एक आदमी प्लेन के नीचे इंतज़ार में खड़ा था।  हमे देखते ही बोला ..."हरी अप ,वी वर वेटिंग फॉर यू " .एयरक्राफ्ट के अंदर गई तो पाया एयरहोस्टेस ,'सुरक्षा निर्देश ' देने की तैयारी कर रही थी और सबलोग हमें घूर रहे थे कि 'कौन हैं ये लेटलतीफ लोग ' . मन कृतञता  से भर गया था और मैंने सोचा था ,जेट एयरवेज़ के वेबसाइट पर जाकर एक धन्यवाद ज्ञापन लिखूंगी। पर लौटते वक्त उनके व्यवहार ने ऐसा मन खट्टा किया कि मैंने थैंक्यू नोट लिखना कैंसल कर दिया.
शिमला 

चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर हम टकटकी लगाए देख रहे थे कि शायद हमारा सामान आ गया हो। और जब काफी देर बाद हमारा बड़ा सा बैग नज़रों की ज़द में आया तो सारी  मायूसी काफूर हो गई.  हमने एक इनोवा बुक की थी , जो हमें चंडीगढ़ एयरपोर्ट से रिसीव कर सारी जगहें घुमा फिर चंडीगढ़ छोड़ जाने वाली थी । बाहर ड्राइवर इंतज़ार में ही था। एक मेजदार बात हुई. मेरे साथ ही एक महिला अपनी ट्रॉली धकेलते हुए जा रही थी...जब हमारी नज़रें मिलीं तो अनजान होते हुए भी हम दोनों एक दूसरे को देख खुल कर मुस्करा दिए, 'हम दोनों ने बिलकुल एक जैसा टॉप पहना हुआ था :) .मुंबई के एक ही स्टोर से खरीदा होगा. 

पर हमारी परेशानी खत्म नहीं हुई थी। अभी हम थोड़ी ही दूर गए थे कि पुलिसवालों ने गाड़ी रोक पेपर दिखाने को कहा. शायद टैक्स नहीं भरा था और उन्होंने गाडी रोक दी। ड्राइवर ने ट्रैवल एजेंसी के मालिक को फोन किया।  अब जब तक वे आते हम सड़क के किनारे चहलकदमी कर तस्वीरें और सेल्फी खींचते रहे। पर भूखे प्यासों की तस्वीर इतनी बुरी आई कि सब डीलीट कर दिए. कार के मालिक के आने और पुलिस वालों से रिश्वत की हील हुज्जत में पूरे दो घंटे बर्बाद हो गए। हमारे शिकायत करने पर उनका कहना था ,'सिर्फ एक दिन लेट हुआ और बैडलक है कि पुलिसवालों ने पकड़ लिया ' (गोया ये उनका नहीं हमारे खराब ग्रह का दोष था ) आगे जाकर एक छोटे से रेस्त्रां में भरपेट तंदूरी रोटी और पनीर टिक्का मसाला खाय तो जान में जान आई.


शिमला में एंटर करते ही घुमावदार सड़कें, लाल, हरे  रंग  वाली टीन की छतें, ऊँचे चीड़ के वृक्ष और उनके पार पर्वतों की चोटियां मन मोह ले रही थीं।  शिमला पहुँचते अँधेरा घिर  आया. शिमला से हमें गर्म कपड़े खरीदने थे।  आगे 'रोहतांग पास' वगैरह में मौसम ठंढा होने वाला था और हम मुम्बईकर के पास गरम कपडे होते  नहीं. मेरा हॉलिडे का मूड, ठंढी हवा,  शिमला की पतली गालियां, छोटी दुकानें, लाल लाल गाल वाले प्यारे से बच्चे। सब कुछ इतना  खुशनुमा लग रहा था कि मन हो रहा था, खरामा खरामा चलती रहूं पर ड्राइवर बार बार फोन कर रहा था कि हमें नारकंडा पहुंचते बहुत रात हो जायेगी, पहाड़ी रास्ता है...और रास्ता भी खराब है. बिना ज्यादा घूमे, मोलभाव किये पहली  दूकान में जो मिला...हमने स्वेटर,जैकेट,मफलर सब खरीद लिया . ( सिर्फ चंद्रताल में जैकेट काम आये ,बाकी स्वेटर वगैरह अब तक वैसे ही नए पड़े हैं. जुलाई के महीने में बाकी सारी जगहों पर जरा भी ठंढ नहीं थी और मौसम बहुत खुशनुमा था। )
नारकंडा का रास्ता सचमुच बहुत ही भयावह था। पतली सी सड़क. कहीं,कहीं कच्ची भी, दोनों तरफ झाड़ियाँ और अँधेरे में सिर्फ हेडलाइट के सहारे बढ़ती हमारी गाड़ी।  बरसों से इतना अँधेरा रास्ता मैंने देखा ही नहीं था. मुंबई में तो सड़कों पर इतनी गाड़ियां और उनके हेडलाइट से इतना उजाला होता है कि दो बार ऐसा हुआ है, मैं तीन घंटे का सफर करके आ गई हूँ और हेडलाइट ऑन ही नहीं की। दोनों बार शाम  को चली थी, रास्ते में अन्धेरा तो हो गया था पर अहसास ही नहीं हुआ. एक बार तो बिल्डिंग के नीचे गाडी पार्क करने के बाद मैंने हेडलाइट ऑफ करने की सोची तो पाया ऑन ही नहीं किया था। दूसरी बार, घर के पास का एक स्ट्रीट लाइट खराब था ,मैंने सोचा इतना अँधेरा क्यों लग रहा तब ध्यान गया कि हेडलाइट ऑन ही नहीं है. ट्रैफिक पुलिस पकड़ लेती तो हेवी फाईन लगता पर उन्हें भी इतनी बत्तियों की चकाचौंध में पता ही नहीं चला होगा. 

अब तक हम थक कर चूर हो चुके थे ,निढाल से पड़े थे। जंगलों के बीच एक ढाबा नज़र आया, ड्राइवर से आग्रह किया गया, 'कुछ खाकर चाय पी जाए।' आँखों के सामने गर्मागर्म समोसे और पकौड़े की प्लेट नाच रही थी। पर ढाबा बिलकुल खाली था ,एक औरत कुछ रख,उठा रही थी. दो लडकियां टी वी देख रही थीं. पता चला, बिस्किट और चाय के सिवा कुछ नहीं मिलेगा. माँ आवाज़ लगाती रह गई, पर देश-विदेश, मैदान- पहाड़ कोई भी जगह हो, किशोरावस्था एक सी होती है. लडकियां टी वी के सामने से नहीं उठीं. माँ ने ही हाथ का काम छोड़ स्टोव जला, चाय बनाई ।  वे लोग जितना हो सके स्टोव या लकड़ियों पर खाना बनाती थीं. गैस बचा बचा कर खर्च करती थीं.

नारकंडा में हमारा होटल एक छोटी सी पहाड़ी पर था. दोनों तरफ ढलान और ढलान पर हल्की रौशनी में नहाते चीड़ के पेड़ एक तिलस्म सा रच रहे थे।  होटल की बगल में कुछ लोहे की कुर्सियां और गोल टेबल रखे थे। किनारे रेलिंग थी और रेलिंग के पार गहरी घाटी।  तभी हल्की सी बारिश शुरू हो गई. होटल के शेड में लगे बल्ब से छन कर आती रौशनी में नाचती बारिश की बूंदें कुछ इतनी भली लग रही थीं कि मन हुआ उस  फुहार में कुर्सी पर देर तक बैठी रह जाऊँ ,पर थके शरीर ने इज़ाज़त नहीं दी। कुछ देर बाद संगीत और शोर शराबे की आवाज़ आने लगी ।  खिड़की से देखा, कुछ युवा उसी फुहार में गाना लगा, पार्टी कर रहे थे। हमने सोचा ये तो शिमला से आये होंगे ,हम तो मुम्बई से करीब २००० किलोमीटर का सफर करके आये हैं। खाना भी हमने रूम में ही मंगवाया और उन सबकी एन्जॉयमेंट पर रश्क करते सो गए.
सुबह मैं सबसे पहले उठ कर बाहर को चल दी। नीचे से होटल तक आती लाल घुमावदार पतली सी सड़क के  दोनों तरफ जहां तक नज़र जाती ,कुहासे में लिपटे लम्बे लम्बे चीड़ के पेड़ नज़र आ रहे थे. . ऐसा दृश्य बस फिल्मों में ही देखा था। शायद किसी ब्लैक एन्ड व्हाईट फिल्म में नायिका जोर जोर से विरह के गीत गाती ,ऐसे ही पेड़ों के बीच भटकती रहती थी . पेड़ पर कुछ बंदर उछलकूद मचाते ,पकडापकड़ी खेल रहे थे। सोचा, मजे है इनके तो आँखें खुली और खेल शुरू , नहाने धोने, खाने-पीने की चिंता ही नहीं...:)

 बहुत शौक था की किसी अनजान शहर में सुबह सुबह मैं अकेली निरुद्देश्य  घुमा करूं. लिहाजा चलती चली गई. शहर बस अलसाया सा अधमुंदी आँखों से माहौल का जायजा ले रहा था. इक्का दुक्का लोग सड़कों पर थे. पर सड़क मरम्मत करने वाले इतनी सुबह से काम पर लगे थे।  सब अठारह-बीस वर्ष के लड़के लग रहे थे। पता नहीं वहीँ के थे या फिर दूसरे शहरों से मजदूरी करने आये थे। इतनी सुबह उन्हें फावड़ा चलाते देख,अपने इस तरह निफिक्र  घूमने पर कुछ गिल्ट भी हुआ.

चौराहे पर एक मंदिर था। लोहे का जालीदार दरवाजा बंद था।  भगवान जाग भी गए होंगे पर पुजारी पर निर्भर थे। वो जब उन्हें नहलाये-धुलाये, भोग लगाए। थोड़ी देर सड़कों पर भटकती रही, पीछे से बेटा भी आ गया। एक छोटी सी चाय की दूकान थी. हमने चाय की फरमाइश की तो दुकानवाले ने कहा, 'अभी बना देता हूँ  '. पूरे हिमाचल ट्रिप पर मैंने पाया ,वे लोग चाय ऑर्डर करने पर बनाते थे. बनी बनाई चाय नहीं होती थी. इस से हमारा फायदा ये  हो जाता कि हम फरमाईशी चाय बनवाते, 'चीनी जरा काम डालना, थोड़ी अदरक इलायची डाल  देना।' 
चाय पीकर हम होटल वापस आ गए।  अब तैयार हो, थोड़ा 'नारकंडा'  घूमते हुए 'सराहन' के लिए निकलना था। सामान पैक करते खिड़की के पार जो नज़र गई तो टूर ऑपरेटर की बात सही साबित होती लगी.उसने कहा  था ," यहाँ  हर दो मिनट  पर दृश्य बदल जाते हैं " अब तक सामने दिखती पहाड़ी बादलों में लिपटी पड़ी थी. अब मानो पहाड़ी ने बादलों की चादर परे  फेंक दी थी . सूरज की नरम रौशनी  में नहाये छोटे छोटे लाल हरे खिलौने से घर खूबसूरत लग रहे थे। मैंने तस्वीरें लेने की सोची पर फिर लगा, हाथ का काम पूरा कर लिया जाये. बैग की ज़िप बंद कर जैसे ही कैमरा ले खिड़की के पास गई....आलसन पहाड़ी ने फिर बादलों की चादर अपने ऊपर खींच ली थी.  कुछ भी नज़र नहीं आ रहा था.
 एक सीख भी मिली,.... जो दृश्य अच्छा लगे, झट कैमरे में कैद करो, वरना बदल जाएगा. 

 (क्रमशः )



इतनी सुबह सडक मरम्मत करते मजदूर 








Thursday, March 16, 2017

"काँच के शामियाने " पर मेरी पुष्पा मौसी की टिप्पणी

'घर की मुर्गी दाल बराबर' कहावत हर बार सही सिध्द होती है . मेरा उपन्यास 'काँच के शामियाने ' काफी लोगों ने पढ़ा और उसपर लिखा भी, किताब के साथ तस्वीरें भी खिंचवा कर भेजीं. पर घर वालों ने चार लाइन में प्रतिक्रिया देकर छुट्टी पा ली. तस्वीर भी नहीं भेजी कोई. लेकिन मेरी सबसे छोटी 'पुष्पा मौसी' ने काफी देर से पढ़ा पर पढ़कर मुझे फोन किया और कहा,मैंने किताब पढ़कर कुछ लिखा है, तुम्हे सुनाती हूँ. सुनने में मुझे कविता सरीखी लगी. मैंने फरमाईश की कि टाइप कर के भेज दो. पर मौसी के लिए देवनागरी में टाइप करना मुश्किल था .फिर मैंने कहा,'पोस्ट कर दो' .वे भी खुश हो गईं कि बड़े दिनों बाद किसी को चिट्ठी भेजूंगी .मैंने भी शायद सदियों बाद कोई पाती पाई .

ये मौसी कम दोस्त ज्यादा हैं. आठ भाई बहनों में सबसे छोटी और अपनी बहन की बेटियों से थोड़ी ही बड़ी. गर्मी छुट्टियों में रात रत भर जागकर हम दोनों ने एक दूसरे को देखी गई फिल्म, पढ़े गए नॉवेल की कहानियाँ सुनाईं हैं. कॉलेज के दिनों में मेरी लिखी कहानियाँ ,इन्होने ही सबसे पहले सुनी हैं. मुझे इनकी एक बात हमेशा याद आती , जब रात के अँधेरे में बिस्तर पर लेटे, हम एक दूसरे को कहानियाँ सुनाते थे तो वे कहतीं, ' कुछ सुनाने में चेहरे के एक्सप्रेशन का भी बहुत महत्व होता है, अँधेरे में तुम चेहरे के भाव नहीं देख पा रही....वरना ज्यादा रोचक लगती कहानी' :)
बहुत शुक्रिया मौसी जी ( शायद पहली बार उन्हें शुक्रिया कह रही हूँ :) )

"कहानियों और कविताओं' की फिसलन भरी घाटी में तुम पूरी तैयारी के साथ उतर गई और 'काँच के शामियाने' उपन्यास की रचना कर दिल की गहराइयों को छू गई .हर महिला कहीं ना कहीं उस किरदार में अपने को ढूँढने लगती है. तुम्हारे उपन्यास में मनुष्यत्व की खोज और बचाव के लिए निकली किरदार जया दिल में उतर जाती है.
सच कहा है --
"भरोसा खुदा पर है, तो जो लिखा है तकदीर में वही पाओगे.
भरोसा खुद पर है तो खुदा वही देगा, जो तुम चाहोगे ."
रश्मि तुम एक सजग लेखिका हो, जो अपने आसपास की चीजों को, संबंधों को बहुत सूक्ष्मता से पकडती हो .और तुम्हारे भीतर का कथाकार उसे बारीकी से चित्रित करता है. अपने पहले उपन्यास 'काँच के शामियाने' में स्त्री-पुरुष के जटिल संबंधों तथा पुरुष के अभिमान की गहरी मनोवैज्ञानिक पड़ताल कर डाली .अपनी सधी हुई लेखनी से लेखिका किसी मनोवैज्ञानिक की तरह जया के भीतर उतरने लगी और पाठक की आँखों से अपने आप आंसू गिरने लगे. तुम पात्रों के भीतर साहसपूर्वक उतरती हो ,कारण ढूंढ लाती हो औए उसका व्यक्तित्व उभार देती हो. तुम्हारे उपन्यास से महिलाओं को एक बड़ी सीख मिलती है. अपने को बचाते हुए वो समाज में क्या कुछ नहीं कर सकती. जज्बा और जरूरत ही किसी स्त्री को महान बनाता है.
रीना (रश्मि ) तुम्हारा लेखिका होना ही तुम्हारा इच्छित संसार है. ढेर सारा आशीर्वाद .
जया के लिए :
"दिन सपनों को सजाने, घर को बचाने में रह गई
रात पति धर्म निभाने, बच्चों को सुलाने में रह गई
जिस घर में अपने नाम की तख्ती भी नहीं
सारी उम्र उस घर को सजाने में रह गई "
(टाइप करते वक्त ध्यान गया ,मनोवैज्ञानिक शब्द दो बार आया है...उन्होंने मनोविज्ञान में एम.ए. किया है, इस शब्द से लगाव लाज़मी है :) )

Thursday, March 2, 2017

परतीमा (कहानी )


प्रशांत ऑफिस में काम में उलझा था कि मोबाइल बजा , बिना नंबर देखे ही उठा कर हलो बोला ,"उधर से किसी स्त्री की जोर की आवाज़ आई ,"हलोss हलोss "…प्रशान्त ने फोन कान से थोड़ी दूर कर लिया ,उसे लगा, रोंग नम्बर है .कट करने ही जा रहा था कि फिर आवाज़ आई,"हलो आप परसांत बोल रहे हैं....परसांत ...प्रशांत शर्मा  " अब ये तो कोई उसके घर की तरफ की ही हो सकती थीं. पर आवाज़ पहचानी सी नहीं लग रही थी। "

  "अरे हम परतीमा …पह्चाने हमको ?' दिमाग पर बहुत जोर डाला पर उसे बिलकुल याद नहीं आ रहा था तभी आगे बोलीं वे, " याद है, तुम मोतीपुर में सातवीं में पढ़ते थे ,हमारे घर के बगल में रहते थे..... चचा का फोन नंबर मिला तो तुम्हारा नंबर भी लिए , खूब बड़े अफसर बन गए हो, अच्छा लगा सुन कर , सादी कर लिए ,बच्चा लोग कैसा है , सबको मेरा आशीर्वाद देना , चलो तुम ऑफिस में बिज़ी होगे ,हमको तो तुम्हारा नंबर मिला तो इंतज़ारे नहीं हुआ। ये मेरा नंबर है, सेव कर लेना , फुर्सत से फोन करना कभी ,अपनी वाइफ से भी बात करवाना … चलो, बाय। " 
जैसे अचानक फोन आया था ,वैसे ही बंद भी हो गया। वो कुछ देर तक फोन घूरता रहा। उसके बाद काम में मन नहीं लगा , बार बार जी उचट जाता आखिर एक कॉफी मंगवाई और कप लेकर खिड़की के पास चला आया। खिड़की से नीचे नज़र आती सड़क पर तेजी से  गाड़ियां आ जा रही थीं. दूर सडक के पार वाला बाउंड्रीवाल,गुलाबी बोगनवेलिया से ढका हुआ था . ऐसे ही तो बचपन के गुलाबी दिन थे वो और उसका मन भी उन गाड़ियों संग तेजी से भाग  निकला. . मोतीपुर में उसके पापा ट्रांसफर होकर गए थे। प्रतिमा और उसका घर पास पास था ,सिर्फ एक दीवार थी बीच में। सामने का बरामदा ,ऊपर जाने वाली सीढ़ी और छत सब साझे थे। प्रतिमा पूरे महल्ले की बिल्ली थी, जब तक सबके घर एक बार न घूम ले उसका खाना हज़म नहीं होता था.. सबको उसके आने जाने की इतनी आदत भी पड़ गयी थी कि जिस घर में शाम तक न गयी हो , लोग चिंतित हो ,आस-पास से उसका हाल चाल पूछने लगते थे कि प्रतिमा ठीक तो है। जिस घर में प्रतिमा की पसंद की चीज़ बनती,एक कटोरी अलग से उसके लिए रख दी जाती. प्रशांत के घर में तो उसका डेरा ही जमा रहता। अपने घर में तो वो टिकती ही नहीं. किसी काम में हाथ नहीं बटाती, चाची छत पर से कपड़े लाने को कहती और वो प्रशांत के यहाँ आकर बैठ जाती। चाची जब गुस्से में उसे ढूंढते हुए आतीं तो वो किचन में छुप जाती। छोटा भाई विशाल खी खी करके मुँह छुपाये हँसता पर उन्हें बताता नहीं. प्रशांत किचन की तरफ इशारा कर देता ,चाची किचन की तरफ बढ़तीं उसके पहले ही प्रतिमा तीर की तरह निकलतीं और बाहर भाग जाती। "तू आ, आज घर में , आज तेरी टाँगे न तोड़ दीं तो कहना ' चाची बड़बड़ाती हुई छत से कपडे लाने चली जातीं। " पर प्रतिमा लौटकर अपने घर में नहीं प्रशांत के घर में पहले आती और फिर जी भरकर उससे लड़ती कि उसने चाची को क्यों बताया कि वो किचन में छुपी है। प्रशांत भी अकड़ता, 'मैं झूठ नहीं बोलता "
    "तो राजा हरिश्चंदर रख लो न अपना नाम " ऐसे मुहं चिढ़ा कर वो कहती कि प्रशांत गुस्से मे उसकी तरफ झपटता . प्रतिमा भागती और उसकी लहराती लम्बी छोटी उसके हाथ में आ जाती। वो चीखती ,"चाची ss ' और मम्मी आकर प्रशांत को डांटने लगती ,'छोडो उसकी चोटी …तमीज नहीं है जरा भी …एक लड़की के साथ ऐसा बिहेव करते हैं "…वो गुस्से से भर जाता , "लड़की होने के बड़े फायदे हैं,अपनी माँ का कहना न मानो, उनसे छुप का बाहर भाग जाओ। लोगो को झूठ बोलना सिखाओ और सब करके साफ़ बच जाओ क्यूंकि लड़की हो ' लड़कियाँ बड़ी चालाक होती हैं। वो गुस्से में भर चल देता। पर प्रतिमा दूसरे दिन ही सब भूल भाल धमक जाती, "चल खेलने चलें"
"हमको नही खेलना तेरे साथ"...वो उसकी कल की बदमाशी भूला नहीं था.
"काहे  हार जाता है इसलिए"....प्रतिमा उसकी हंसी उडाती हुई बोलती.
"कब हारें हैं रे तुझसे "वो लाल आँखें दिखाता
    "तो चल न"...प्रतिमा,उसका हाथ खींचती हुई ले जाती। वो हाथ झटक कर आगे बढ़ जाता। शाम को महल्ले के सब लड़के मिल कर पिट्टो,डेगा-पानी,लंगडी, आइस पाइस खेलते। लडकियां रस्सी कूदतीं या इक्ख्त दुक्ख्त खेलतीं. नहीं तो बातें करती हुई टहलती रहतीं.पर प्रतिमा को तो कूद -फंड पसंद थी. वो क्या लड़कियों के साथ खेलती. वो लडकों के संग सारे खेल खेलती. प्रशांत  पिट्टो में प्रतिमा पर जोर से बॉल का निशाना लगाता कि प्रतिमा को खूब चोट लगे पर वो बहुत तेज थी हर बार बच जाती और उसे अंगूठा दिखाती। कभी कभी प्रशांत  छुपकर कंचे भी खेलता .मम्मी -पापा की तरफ से कंचे खेलने की सख्त मनाही थी. मम्मी कहतीं, 'कंचे गली के लडके खेलते हैं '.उसे समझ नहीं आता, ये गली के लडके कौन होते हैं. वे लोग भी तो सडक के किनारे ही खेलते थे . पर तब आज के बच्चों की तरह , फट से माता-पिता से सवाल करने का रिवाज नहीं था. उनकी जितनी बातें समझ में आईं,समझो वरना सर के ऊपर से गुजर जाने दो.  प्रतिमा उसे कंचे खेलते देख लेती तो फिर ब्लैकमेल करती कि मैथ्स का ये सवाल बना दो वरना  चाची को बता दूंगी। खीझते हुए भी उसे उसका  होमवर्क करना ही  पड़ता.
प्रशांत ने कॉफ़ी का एक लम्बा घूँट भरा...क्या दिन थे वे भी , सिर्फ पढना  लिखना, खेलना, कूदना। पढाई का भी कोई बोझ नहीं. सिर्फ हिसाब वाले मास्टर जी कुछ सवाल घर से बनाने कर लाने  को देते .वरना कोई होमवर्क नहीं. ना परीक्षा का कोई खौफ ,ना परसेंटेज की कोई होड़.
आये दिन कोई न कोई त्यौहार पड़ता और सारा महल्ला ही वो त्यौहार मिलकर मनाया करता था। होली, दिवाली दशहरा ,सरस्वती पूजासब खूब धूमधाम से मनाते.  दशहरे का मेला सारे बच्चे मिलकर देखने जाते , एक बार प्रतिमा ने पचास पैसे की एक पीतल की अंगूठी खरीदी थी। शरारती तो थी ही पता नहीं अंगुली में कैसे दाँत से दबा कर पिचका ली थी। अंगुली सूज कर मोटी हो गयी थी और उसका रो रो कर बुरा हाल। वो चिढाता,'अब तो अंगुली काटनी पड़ेगी' प्रतिमा का रोना और बढ़ जाता.दोनों की मायें परशान हो गयी थीं। पिता ऑफिस गए हुए थे , फोन तो था नहीं जो उन्हें बुलाया जा सके। उस छोटे से कस्बे में औरतें बाज़ार नहीं जातीं थीं. और तब ये जिम्मेवारी उसे सौंपी गयी थी। वो महल्ले के बच्चों की फ़ौज के साथ बड़ी जिम्मेवारी से सुनार के यहाँ से उसकी अंगूठी कटवा कर ले आया था। प्रतिमा ने भरी आँखों से रुंधी आवाज़ में पहली बार उसे 'थैंक्यू 'कहा था। मन तो हुआ फिर से चिढ़ाने लगे पर उसकी रोनी सूरत देख दया आ गयी थी। दो दिन प्रतिमा ने उसका अहसान मान लड़ाई नहीं की पर तीसरे दिन ही सब भूल भाल…'चाची देखिये, परसाांत पढाई का किताब नहीं कॉमिक्स पढ़ रहा है " और उसकी गुस्से से लाल आँखे देख अंगूठा दिखा भाग गई थी। उसे सचमुच अफसोस हो गया था , बेकार ही ले गया था सुनार के पास। हो जाने देता उसकी अंगुली, हाथी के पाँव जैसी।

    पर दिवाली के समय प्रतिमा सारी दुश्मनी भूल जाती। उसका और प्रतिमा का सामने वाले घर के  गगन और मिथिलेश से पटाखे छोड़ने का कम्पीटीशन होता । अपने सारे बचाये पैसे उसे दे देती कि वो पटाखे ले आये। किसी भी बच्चे को बहुत ज्यादा पैसे तो मिलते नहीं थे ,तो कम्पीटीशन होता कि किसने सबसे अंत में पटाखे छोडे. प्रतिमा  घर-घर की   बिल्ली तो वो थी ही ,चुपके से उनके घर में जाकर देख आती कि उन्होंने कौन से पटाखे और कितने पटाखे खरीदे हैं और फिर दोनों उसी हिसाब से पटाखे छोड़ते. बहुत देर तक मिथिलेश और गगन के घर के सामने से पटाखों की आवाज़ नहीं आती तो प्रशांत अंतिम रॉकेट छोड़ने के लिए उद्धत होता पर प्रतिमा कहती, 'नहीं.,रुको अभी ..उनका एक अनार अभी बचा हुआ  है, हम गिने हैं.वो लोग अभी तक पांच ही अनार जलाया है जबकि छः लाया था . और फिर उनके अनार जलते ही ,प्रशांत विजयघोष सा अंतिम राकेट छोड़ देता. किसकी छत पर दिए देर तक जले, इसका भी कम्पीटीशन होता। छत तो साझा थी, दोनों देर रात तक  जागकर दिए में तेल डाला करते। एक भूली सी मुस्कराहट प्रशांत के चहरे पर आई. आज तो रंग बिरंगे बिजली के बल्ब लगा दो वे दूसरे दिन तक जलते रहेंगे। बस एक स्विच ऑन ऑफ करना ही तो  होता है.
 खिड़की छोड़कर प्रशांत  ने वापस काम में मन लगाने की कोशिश की पर बचपन के वे दिन, मोतीपुर की गालियां ही जेहन में घूमती रहीं। आजकल न्यू इयर पार्टी का बड़ा शोर होता  है. इकतीस  दिसंबर को देर रात तक पार्टी करते हैं लोग और फिर नए साल की सुबह देर तक सोये रहते हैं। नए साल का सूरज तो कोई देखता ही नहीं. और एक उनका बचपन था। सुबह सुबह नहा धोकर वे लोग मंदिर जाते और फिर जलेबी पूरी का नाश्ता करते और फिर सारे बच्चे मिलकर छत पर पिकनिक मनाते। उस दिन कोई झगड़ा नहीं होता। सबकी मम्मियां भी भरपूर मदद करतीं। छत पर  आकर चूल्हा सुलगा देतीं पर इस से ज्यादा कोई मदद नहीं लेते वे लोग। आज के दिन लड़कियों के रौब सह लेते . शोभा, रीता, निर्मला सब लडकों के  उम्र की ही थीं, पर बड़े सलीके से सारे काम कर लेतीं.  आलू गोभी मटर की खिचड़ी और चटनी बनती .खिचड़ी का वैसा स्वाद फिर  कभी नहीं आया । लडके पानी ढो कर लाने का , आलू छील देने का, पत्तलें लगाने का, उठाने का काम  बखूबी करते। कौन ज्यादा काम करता है ,इसकी ही होड़ लगी होती।

 पिकनिक ख़त्म होते ही सरस्वती पूजा की तैयारियां शुरू हो जातीं। सारे बच्चे मिलकर सीढ़ी के ऊपर थोड़ी सी खाली जगह थी, वहीँ प्रतिमा लाते। हर घर से वे लोग चंदा इकठ्ठा करते. और फिर उन पैसों से साधारण सा प्रसाद लाते. थोड़ी सी बूंदी , बताशे और फल. सजावट के लिए मम्मी लोग उदारता पूर्वक साड़ियां दे देतीं। रंगीन कागज़ों को तिकोना काटकर वे लोग पताका बनाते। लडकियां साड़ियों से सजावट करतीं। लड़के रस्सी टांगकर रंगीन कागज़ों की झंडियां लगाते। प्रसाद काटना ,प्रसाद बांटना हर काम वे लोग मिलकर करते।
 पर  मोतीपुर छोड़ने से पहले अंतिम सरस्वती पूजा में बड़ा हंगामा हुआ था ।एक नई लड़की आई थी महल्ले में ।बहुत सज संवर कर रहती. अपने पिता के अफसर होने का उसे बड़ा घमंड था ।खूब कीमती फ्रॉक, सुन्दर सैंडल पहन और रंग बिरंगे हेयर बैंड लगा कर शाम को आती ।खुद भी नहीं खेलती और लड़कियों को भी नहीं खेलने देती,उन्हें बिठा कर लंबी लंबी डींगे हांक करती ।लड़कों पर उसका रौब नहीं चलता, इसलिए उनसे चिढ़ी रहती ।अब तक सरस्वती पूजा में सबलोग एक बराबर चन्दा दिया करते थे । इस नई लड़की ने ज्यादा पैसे दिए । अपनी माँ की ढेर सारी कीमती साड़ियां लाई और विसर्जन के लिए अपने पिता से कहकर एक जीप  अरेंज कर दी थी।
प्रतिमा को छोड़कर बाकी सारी लडकियां उसकी मुरीद हो गयी थीं ।लड़कों ने मूर्ति लाने का ,सजावट का सारा काम तो किया पर दूसरे दिन लडकियों ने उन्हें गैरों की तरह एक एक प्रसाद का दोना देकर चलता कर दिया ।
    इस तरह मक्खी की तरह निकाल कर फेंक दिए जाने पर लड़के कड़वा घूँट पीकर रह गए ।विसर्जन के लिए भी जीप में बैठकर सिर्फ लडकियां ही गईं . उस अपर्णा के पिताजी का एक चपरासी और ड्राइवर साथ था . लडकों को बिलकुल ही नहीं पूछा.
    पर वे भी ताक में थे जैसे ही लडकियां विसर्जन के लिए गयीं ,वे बंचा हुआ  सारा प्रसाद चुरा लाये । कुछ खुद खाया और बाकी रास्ते पर आने जाने वालों में बाँट दिया ।लड़कियों को आग बबूला तो होना ही था , खूब चीखी-चिल्लाएँ.। घर वालों से भी इस हरकत के लिए बहुत डांट पड़ी ।पर किसी को बुरा नहीं लगा।सब सर नीचा किये मंद मंद मुस्काते रहे ।सामूहिक रूप से डांट खाने का मजा ही कुछ और होता है ।
एक ठंढी सांस निकल गई । आज अपनी मोबाइल और लैपटॉप में घुसे गेम खेलते बच्चे क्या जानें ये मिलजुल कर खेलना, शैतानियाँ करना और डांट खाना .
    प्रतिमा ,उसके घर में इतनी ज्यादा रहने लगी थी कि अनजान लोग उसे मम्मी पापा की बेटी ही समझते ।बस फर्क ये था कि वो और विशाल पापा से बहुत डरते थे जबकि प्रतिमा बिलकुल नहीं झिझकती । बड़े आराम से कह देती ,'चचा इस शर्ट में आप बहुत स्मार्ट लग रहे हैं ।'...पापा के सामने भी गाना गाती रहती ।अब वो दसवीं में आ गई थी ।और अब तक पढ़ाई को टाइमपास की तरह लेने वाली और जैसे तैसे पास होने वाली प्रतिमा घबराने लगी थी ।उसका मैथ्स बहुत कमजोर था ।उसके घर में पढ़ाई को और वो भी लड़की की पढ़ाई को ज्यादा महत्त्व नहीं दिया जाता था ।ट्यूशन का तो सवाल ही नहीं ।आखिर उसकी रोनी रोनी सूरत देख पापा ने कहा ,वे उसे पढ़ायेंगे ।और उसके बाद प्रतिमा का एक दूसरा रूप ही सामने आया ।सुबह सुबह ही वो किताब कॉपियां लेकर बरामदे में जम जाती। कोई सम सौल्व नहीं कर पाती तो सोते हुए पापा को झकझोर कर जगा देती,"चचा उत्तर नहीं मिल रहा है " और आश्चर्य पापा, जरा भी नहीं गुस्सा करते ।चश्मा लगाते और सवाल समझाने लगते ।वरना सोते हुए पापा के कमरे के बाहर भी व लोग डरते डरते गुजरते थे कि कहीं आवाज़ न हो जाए ।पाप के ऑफिस जाने से पहले वो पढ़ती,दोपहर में पापा के दिए सम्स सौल्व करती ।रात में भी देर तक पढ़ती । यहाँ तक कि उसे और विशाल को डांट पड़ने लगी थी कि "देखो ,'कितना मन लगाकर पढ़ती है ..सीखो कुछ उस से " प्रतिमा की बोर्ड की परीक्षा तो हो गयी, पेपर भी अच्छे हुए थे ।पापा ने मैथ्स का पेपर सौल्व करवाया था और संतुष्ट भी थे ।पर उसका रिजल्ट आने से पहले ही उनका ट्रान्सफर हो गया और वे लोग नए शहर में आ गये थे । रिजल्ट आने के बाद,प्रतिमा ने पापा को चिट्ठी लिखी थी और पापा बहुत खुश हुए थे । आने जाने वाले सबको पापा बड़े गर्व से प्रतिमा के रिजल्ट के बारे में सुनाते । उसके बाद प्रतिमा की याद धीरे धीरे धूमिल होती गई ।मम्मी कभी कभी पड़ोस की आंटियों से उसकी शरारतों की चर्चा करतीं । वो तो अपने खेल ,कॉलेज ,कैरियर में प्रतिमा को बिलकुल भूल गया था । आज उसके फोन कॉल ने पूरा बचपन लौटा दिया, उसका ।रात में माँ का फोन आया ," प्रतिमा का फोन आया था कि उसने तुमसे बात की है ।बहुत खुश लग रही थी "
    "हाँ माँ, बिलकुल  वैसी ही है अभी भी चिल्ला चिल्ला कर बोलती है, और अपना नाम अब भी परतीमा बताती है,प्रतिमा नहीं  "...प्रशांत हंस पड़ा था .

    "नहीं बेटा, वो तुमसे बातें करने की ख़ुशी में बोल रही होगी । दुःख का पहाड़ टूटा है उसपर । शादी अच्छे घर में हुई थी पर बच्चे छोटे थे तभी पति की मृत्यु हो गई ।पर प्रतिमा ने सबकुछ अच्छे से संभाल लिया ।बेटी की शादी कर दी ।बेटा भी नौकरी में आ गया है ।वो ,टीचर है एक स्कूल में । हमारे बगल के फ़्लैट में एक सज्जन आये हैं ।वे प्रतिमा के ससुराल के रिश्तेदार हैं ।एक दिन तुम्हारे पापा,अपनी नौकरी की बातें कर रहे थे उसी क्रम में जैसे ही मोतीपुर का नाम लिया । उन्होंने बताया कि मोतीपुर की प्रतिमा उनके रिश्ते में है और फिर तो पापा ने उनसे नंबर लेकर प्रतिमा  से बात की  ।मुझ से भी बात हुई. तुम सबलोग का हाल चाल पूछ रही थी ।तुम्हारा नंबर लिया ।तुमसे बात करने के बाद भी मुझे फोन करके बताई पर बोल रही थी तुम ऑफिस में थे ,ज्यादा बात नहीं हुई ।बात कर लेना बेटा ,बहुत खुश होगी ।"

    "हाँ मम्मी जरूर किसी सन्डे सैटरडे करूँगा .." यह सब सुनकर उदास हो गया वह.विधाता ने  किसके भविष्य की टोकरी में क्या सहेज कर रखा है, किसी को पता नहीं होता. उछलती-कूदती,शरारती प्रतिमा के इतने जिम्मेवार रूप की कल्पना भी नहीं कर पा रहा था . कैसे उसने सम्भाला होगा सबकुछ . या शायद इतनी एक्टिव, मिलनसार, हंसमुख होने के कारण ही उसने सब अच्छे से सम्भाल लिया  वरना कोई  सरल सहमी सीधी सी लडकी होती तो बिखर ही जाती. पहली फुर्सत में ही प्रतिमा को कॉल करेगा  और फिर ढेर सारी बातें करेगा . उसने सोच तो लिया था  पर छुट्टी के दिन कुछ आराम में ,कुछ परिवार के साथ समय बिताने, कुछ बाहर जाने, कुछ मेहमानों की खातिर तवज्जो में याद ही नहीं पड़ा और कई महीने गुजर गए ,वो फोन करना भूल ही गया.
    पर आज टी वी पर बिलकुल प्रतिमा जैसी गोल चेहरे वाली गोरी सी कमर तक दो चोटी लटकाए एक लड़की को कूदते - फांदते, शरारतें करते देखा तो प्रतिमा की बेतरह याद हो आई । बिना एक पल गंवाए उसने प्रतिमा को फोन मिला दिया ।पर उसने फोन नहीं उठाया ।बाद में प्रतिमा ने कॉल बैक किया तो वो बाथरूम में था । उसने फिर से फोन किया पर पूरे रिंग के बाद फोन नहीं उठा ।पर उसे भी जैसे जिद हो आई थी ,आज प्रतिमा से बात करनी ही है । उसके बाद पांच पांच मिनट पर उसने कई बार फोन मिलाया पर प्रतिमा ने फ़ोन नहीं उठाया ।और जब काफी देर बाद प्रतिमा ने कॉल बैक किया तो वो गुस्से में फट पड़ा ,"कहाँ थी ? कब से फोन कर रहा हूँ ...फोन नहीं उठाया जाता "
    "शान्ति शान्ति अरे बाबा गुस्सा वैसा ही है,तुम्हारा  " प्रतिमा के ये कहने पर ध्यान आया कि वह पूरे तीस  साल बाद उस से बात कर रहा है । प्रतिमा ने कहा," मंदिर में थी न ,इसलिए फोन नहीं उठा पाई ।सिद्धिविनायक आई हुई हूँ न"
    "अरे तुम मुंबई में ..मेरे शहर में हो ...कब आई एक फोन भी नहीं किया ।"
    " वो  चेक अप के लिए आई थी...पर आज ही रात की वापसी है "
"चेक अप...कैसा,किसका  चेक अप
.अरे मुझे ही पांच साल पहले ब्रेस्ट कैंसर हो गया था. ऑपरेशन हो गया है , अब ठीक  हूँ .पर छः महीने में चेक अप के लिए आना पड़ता है. आज ही  रात की ट्रेन है,इसलिए फोन नहीं कर पाई,अगली बार पक्का बताउंगी "
 वो दुःख से भर उठा .विधाता ने  दो बच्चे सौंप कर पति छीन लिया , इतने से भी संतोष ना हुआ  तो  कैंसर की सौगात भी दे डाली .कोई अगर बर्दाश्त करने में सक्षम है तो उसे दुःख पर दुःख दिए जाओ. किसी की जिंदादिली की ऐसी कठिन परीक्षा भी ली जाती है.
 अपराधबोध भी सताने लगा ,"प्रतिमा ने इतने उत्साह से फोन किया था पर उसने पलट कर एक बार भी फोन नहीं किया ,प्रतिमा ने सोचा होगा उसे बात चीत करने में कोई रुचि नहीं है ।
पर अब ज़रा भी समय नही गंवाना है. प्रशांत ने कहा "ठीक है रात की ट्रेन है न ...मैं अभी आता हूँ तुम्हे लेने ...रात को स्टेशन छोड़ दूंगा ।चिंता मत करो ।"
    "तुम आओगे, फिर लेकर जाओगे सारा समय तो आने जाने में ही चला जायेगा ...हम ही आ जाएंगे लोकल से "
    "ठीक है साथ में कौन है उसे फोन दो मैं रास्ता समझा देता हूँ "
    "अरे मैं अकेले ही आई हूँ । पांच साल से आ रही हूँ, कई महीने रही हूँ. मुम्बई पूरा जाना -पहचाना है . वैसे भी कौन खाली है ,सब अपने काम में बिज़ी हैं । किसी को परेशान भी क्यूँ करें. हमको ही बताओ ,हम आ जायेंगे ।"
उसने सोचा ,प्रतिमा तो शुरू की स्मार्ट है ।यहाँ सालों से रहने वाले भी लोकल से अकेले सफ़र करने की हिम्मत नहीं कर पाते और ये बाहर की लड़की 'और फिर हंस दिया.. "लड़की??" ...उसकी बेटी की शादी हो चुकी है ।उसने प्रतिमा को समझाया कि अमुक स्टेशन पर वेस्ट साइड में आकर खड़ी रहे ।वो लेने आ जाएगा ।
स्टेशन पहुँच वो इधर उधर देख रहा था ।इतने चेहरों की भीड़ में उस चेहरे को ढूंढें भी कैसे जिसकी अब उसे पहचान भी नहीं ।तभी दाहिनी तरफ से एक आवाज़ आई," परसांssत..." मुड़ कर देखा ,"अरे तो ये है प्रतिमा ।वक़्त की मार से प्रतिमा का गोरा रंग कुम्हला गया था ।कमर तक लटकती काली चोटियों की जगह अब कंधे तक कच्चे पक्के बाल एक क्लिप में बंधे थे ।पतली छरहरी देह थोड़ी फ़ैल गई थी .
उसे अपनी तरफ देखते पा कर प्रतिमा पास आ गई ,बोली, "हम तो पहचान ही नहीं पाते पर तुम अब बिलकुल वैसे ही दिखते हो, तब जैसे चचा दिखते थे .पर चचा तुमसे पतले थे " और फिर हंस कर बोली ,"कितना मोटा गए हो "
 चश्मे के पीछे से झांकती प्रतिमा की आँखों की चमक और शरारती हंसी वैसी ही थी ।उसके हाथ से उसका बैग लेते हुए उसने भी हंस कर कहा ,"और तुम नहीं मोटाई . ,एकदम बुढ़िया लगने लगी हो ।"
    "बुढ़िया कहेगा ,मुझे ..."प्रतिमा ने उसे जोर की कोहनी मारी और दोनों के बीच से बीच के वर्ष छलांग लगा, कहीं बिला गए  । दोनों स्कूली बच्चे से ठठा कर हंस पड़े ।