Sunday, May 27, 2012

बदलता मौसम....छंटते बादल..(कहानी -- 15 )


कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा . जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.बेटे के जन्म के बाद बेटे को उस से छीन लिया गया.  उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. .उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर  गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि  उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया   है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया पहले एक स्कूल में फिर बैंक  में नौकरी कर ली...पर राजीव बैंक में उसे बहाने से तंग करते रहे ..वाहन के अधिकारियों ने भी उसका शोषण करना चाहा...उसके शिकायत करने पर उसे नौकरी से अलग कर दिया.) 

गतांक से आगे 

राजीव ने डिवोर्स फ़ाइल कर दिया था ....पर साल गुजर गया और सुनवाई नहीं हुई...फैसले के तो कोई आसार ही नहीं. पर दहशत बनी रहती. पता नहीं बच्चों की कस्टडी उसे मिले या नहीं.
एक बार बच्चों को लेकर कोर्ट गयी थी. फिर खुद अकेले वकील के साथ ही जाती रही ...पर अक्सर राजीव ही उपस्थित नहीं होते और डेट आगे बढ़ जाती. 
एक दिन महिला सेल की डी.एस.पी. मिलने आयीं. पहले भी महिला सेल के अधिकारी उसका हाल-चाल लेने आते रहते थे...और वो उन्हें झूठी तसल्ली देती रहती थी कि 'सब ठीक है'....उन्होंने प्रस्ताव रखा कि एक बार उनके ऑफिस में आकर मिल ले..'राजीव बात करना चाहते हैं...'  
पहले तो उसने मना कर दिया लेकिन फिर सोचा..'चलो अच्छा है ..डी.एस.पी. की उपस्थिति में ही पूछ लेगी कि जब उन्होंने डिवोर्स फ़ाइल  कर  दिया है...उस से अलग होना  चाहते हैं...फिर उसे अपनी शर्तों पर जीने क्यूँ नहीं दे रहे?....क्यूँ उसकी नौकरी ट्यूशन छुडवाने की कोशिश क्यूँ करते रहते हैं...? "

पर ये सब पूछने का मौका ही नहीं आया. घर पर तो वे डी.एस.पी बड़ी मृदुता से बात कर रही थीं. पर वहाँ उनके तेवर ही बदले हुए थे. राजीव पहले से ही उनके ऑफिस में बैठे हुए थे और वे उस से ही उल्टा सवाल कर रही थीं कि "वे बच्चों  को लेकर क्यूँ चली आई हैं...ये बच्चे से मिलने को तरस रहे हैं....मिलने क्यूँ नहीं देतीं.?? " 

वो तो जैसे आसमान से गिरी....कोर्ट में दो घंटे बच्चे, राजीव की नज़रों के सामने थे और राजीव ने एक बार उनके सर पर हाथ  नहीं फेरा...उनसे एक बात नहीं की और अब उसपर उल्टा आरोप लगा रहे हैं कि "वो मिलने नहीं देती"
"बच्चे इनके भी हैं...ये जब चाहें मिल सकते हैं...मैं कैसे मना कर सकती हूँ.."..उसने अपनी बात कही.
"अरे ई इतना जहर भर दी हैं, बच्चा सब के मन में कि मिलना ही नहीं चाहता है,ऊ लोग .....हमसे दूर कर दी हैं..ऊ सबको." राजीव गरजे.
"बच्चों ने आपके जुल्म सब अपनी आँखों से देखे हैं...इसीलिए दूर हो गए हैं....मैने कुछ उन्हें नहीं सिखाया-पढाया  " उसकी आवाज़ भी तेज हो गयी.
"अब वो सब तो पति-पत्नी के बीच ...थोड़ा-बहुत चलता ही रहता है...इसका मतलब ये तो नहीं कि बाप को बच्चों से अलग कर दिया जाए.." डी.एस.पी. पता नहीं कौन सी बोली बोल रही थीं.
"लगता है..आपको हमारे केस के बारे में कुछ मालूम नहीं..प्लीज़ आप पहले सारी फ़ाइल पढ़िए और जानने की कोशिश कीजिए...कि क्या कुछ हो चुका है.."
"हम एक नज़र में ही सब जान लेते हैं...पुलिस वाले की नज़र है...आप सताई हुईं तो बिलकुल नहीं लगतीं..." 

राजीव ने भी एक भरपूर नज़र डाली उस पर और वो थोड़ी सी असहज हो गयी. ये तो सच था....एक साल में उसकी काया पलट हो गयी थी. अब घर से बाहर निकलना पड़ता...खुद को प्रेजेंटेबल रखती. अपने रखरखाव...अपने कपड़े का ख्याल रखती. कॉटन की तीन-चार साड़ियाँ ही थीं उसके पास. पर स्टार्च लगी हुई...मैचिंग ब्लाउज के साथ ही पहनती वह.
एक हाथ में कड़ा.. ...और दूसरे में घड़ी. माथे पर छोटी सी काली बिंदी और ढीली सी एक  चोटी. बस इतना सा श्रृंगार था उसका. पर उसका यह सादा रूप भी लोगों की आँखों में चुभता. शायद उसकी वजह थी उसकी चपलता और होठों पर सजी मुस्कराहट. पर अपना दुख छुपाये रखने के लिए इस मुस्कराहट का आवरण भी जरूरी था. 

अब अपने खाने-पीने का भी ख्याल रखने लगी थी. सोचती ,उस पर ही पूरे घर -बच्चों की जिम्मेदारी है, वो बीमार पड़ना अफोर्ड नहीं कर सकती. पहले जहाँ दो दो दिन डिप्रेशन के मारे अन्न का दाना नहीं डालती थी मुहँ में. अपने ऊपर किए गए जुल्मों के विरोध का और कोई तरीका था भी  नहीं, उसके पास ...और वो खाने पर ही अपना सारा क्रोध निकालती. शायद राजीव के घर में दिन के दो बजे के पहले कभी खाना खाया भी नहीं. घर का  सारा सारे काम निबटाते इतना वक़्त हो ही जाता . उनके यहाँ ,नाश्ता तो शायद कभी किया ही नहीं.
पर अब सुबह चाय भी दो बिस्किट के साथ लेती कि कहीं एसिडिटी ना हो जाए..समय पर नाश्ता-खाना. रात में भी नौ बजे के पहले खाना निबटा देती. अब घर में पहले किसी पुरुष को  खाना खिलाने का इंतज़ार नहीं करना था. इस अनुशासित दिनचर्या का असर उसके शरीर पर भी पड़ा था. मुरझाया चेहरा खिल आया था. दबा हुआ रंग निखर गया था. उभरी हड्डियां अब छुप गयी थीं. 
और खुद में आए ये सारे परिवर्तन उसने राजीव की नज़रों के प्रतिबिम्ब में भी देखे. 

पर उसने सीधी बात करने की सोची.." ठीक  है....कोर्ट में केस चल ही रहा है...यहाँ बहस से क्या फायदा...आप कह रही थीं..बात करनी है...बताइए क्या बात करनी है?.."
"ई चाहते हैं..आप वापस लौट आइये...इनकी बहुत बदनामी हो रही है.." डी.एस.पी बोलीं.
"ये अब संभव नहीं...आगे बोलिए " उसने दो टूक बात की.
"क्यूँ संभव नहीं....इनको आपसे शिकायत है...आपको इनसे...बैठ कर सुलह कर लीजिये..और अपना घर दुआर संभालिये अब  "
"मुझे कुछ काम है...अब जाना होगा..." कहती वो उठ गयी.
"अरे रुकिए तो...बात  तो कीजिए..." डी.एस.पी. कहती रह गयीं...वो उठ कर चली आई. 
थोड़ी दूर आने के बाद पाया....वो अपने साथ लाया थैला तो वहीँ बगल की कुर्सी पर छोड़ आई  है.
मुड कर वापस लौटी ..ऑफिस के दरवाजे पर ही थी कि सुना, डी .एस.पी. साहिबा कह रही थीं.." अब हम तो अपनी तरफ से कोशिश किए पर वो बड़ी जिद्दी हैं.."
जैसे ही अंदर कदम रखे, देखा ...राजीव एक नोटों का बंडल..डी.एस.पी. को पकड़ा रहे थे.
उसे देखते ही जल्दी से हाथ नीचे कर लिए पर वो देख चुकी थी और समझ चुकी थी कि इसीलिए डी.एस.पी. इन पैसों की भाषा बोल रही थीं. 

***
नियमित धनोपार्जन कुछ था नहीं...नौकरी मिलती और छूटती रही...पर अच्छी बात ये रही कि  छूटने के बाद भी नए अवसर मिलते रहे. नए ट्यूशन ले लिए....सुबह सुबह अखबारों में नौकरी के विज्ञापन वाले कॉलम देख कर पेन से गोल घेरा बना देती और फिर शुरू होता सिलसिला फोन करने का.

अब घर में फोन लग गया था...ये सुविधा तो हो गयी थी पर उसके जीवन में एक अच्छी बात भी अपने साथ ढेरों तकलीफें लेकर आती . राजीव ने भी कहीं से घर के नंबर हासिल कर लिए और फोन पर गालियों का सिलसिला शुरू कर दिया. बच्चों को भी नहीं बख्शते . उन्हें धमकाते..'तुमलोगों को तो मेरे पास ही रहना होगा..." ..देखना कोर्ट तुम्हारी कस्टडी  मुझे ही देगा..तुम्हारी माँ  कमाती है, क्या ?.कहाँ से खिलाएगी??..कहाँ से पढ़ायेगी ?."
बच्चे  बुरी तरह से डर जाते. अक्सर उन्हें तेज बुखार आ जाता. रात को  नींद से हडबडा कर उठ जाते. कोई बुरा सपना देखा होता उन्होंने. वो बहला देती...'ऐसा कुछ हुआ तो हम सबलोग  दूर किसी शहर में  भाग  जायेंगे...किसी को  पता नहीं लगने देंगे कहा जा रहे हैं.." वे छोटे थे..उसकी बातों पर विश्वास कर के आश्वस्त हो जाते. पर वो चिंता में पड़ जाती कहीं सच में कोर्ट ने कस्टडी उन्हें सौंप दी तो क्या करेगी वो??

फोन की घंटी बजती तो उसका दिल धड़क जता..'कहीं राजीव ना हों' कभी कभी देर रात घंटी घनघनाती...वो चौंक कर फोन उठाती, शायद भैया -दीदी लोगो का हो..कोई जरूरी बात हो...पर उधर से आतीं राजीव की नशे में डूबी आवाज़ में धमकियां...'तुम्हे देख लूँगा' के साथ गालियों की जो बौछार शुरू होती कि उसे फोन रिसीवर पर से हटा कर रखना  पड़ता .कई बार सुबह फोन वापस क्रेडल पर रखती और फोन घनघना  उठता ...यानि कि नशे में धुत्त राजीव पूरी रात ट्राई करते रहते.

एक दिन एक फोन आया, कि "मैडम जी, मुझे ईश्वर का संदेश मिला है कि आप बहुत परेशानी में हैं ...अगर शनिवार को आप हमारे पास अकेले आएँ तो आपके सारे कष्ट दूर कर सकता हूँ "
वो समझ गयी ये भी राजीव की एक चाल है...टालने के लिए बोली, "ठीक है...आ जाउंगी.."
"बहुत बढ़िया ..अभी आपको पता बता देते हैं और जरा अपना 'डेट ऑफ बर्थ' बता दीजिये तो..."
"जो बगल में खड़ा होकर फोन करवा रहा है,ना...उसी से मांग लीजिये .." कहकर उसने फोन रख दिया.
पर राजीव हार मनाने वाले नहीं थे...एक दिन माँ ने बताया कि उन्होंने फोन उठाया था और राजीव ने कहा कि वे बच्चों से मिलना चाहते हैं...इतवार को उनसे मिलने आ रहे हैं.."
वो मना तो कर नहीं सकती थी,चुप रही. 
इतवार को राजीव तीन-चार अजीब से लोगों के साथ आए. आते ही कहने लगे ," इनलोगों का कहना है कि हमारी जिंदगी पर बुरा साया है...आप पर किसी ने जादू-टोना कर दिया है...ये लोग सब ठीक कर देंगे " 
"पर आपने तो कहा था...आपको बच्चों से मिलना है.."
"हाँ उनसे भी मिल लेंगे...पहिले  ई लोग का ज़रा बात सुन लिया जाए..का हर्जा है...हमको भी बुझा रहा है....कोई कुछ टोना कर दिया है...एकदम से आप कईसे बदल गयीं...आप तो केतना सीधी-सादी  थीं..तनका इलोग का बात सुन लीजिये.."

राजीव के लगातार अत्याचार ने उसके अंदर की शक्ति को ललकार कर जगा दिया है...ये बात वे समझ  नहीं पा रहे थे या शायद उनका अहम् स्वीकार नहीं कर पा रहा  था. इसलिए नित नई चाल चल कर उसे तोड़ने की कोशिश में संलग्न थे.

उसने बच्चों को अंदर भेज दिया और दरवाजे के पास खड़ी हो गयी. समझ नहीं पा रही थी..इन्हें कैसे घर से निकाले...राजीव कुछ तमाशा ना कर दें...बेकार महल्ले में बात फैलेगी.
एक लाल आँखों वाला आदमी  सीधा उसकी तरफ देखते हुए बोला.."इसके सर पर एक साया मंडरा रहा है...मुझे यहीं से दिख रहा है... तनी इधर आओ..."
वो अपनी जगह से हिली नहीं...तो वो राजीव से बोला..." ई साया इनको बस में कर लिया है...वही ई सब करवा रहा है.,..इनका कौनो दोस नहीं है..."
"आइये आइये इधर आइये तनिका.....ई सब ठीक कर  देंगे .." राजीव ने कहा.
उसका दिमाग तेजी से दौड़ रहा था...कैसे निबटे इन सबसे. तब तक उस आदमी ने खुद ही उपाय थमा दिया .बोला, "ठीक है...वहीँ खड़े रहिए...ई बताइए आपको मन में कैसा बुझाता है...कैसा फील होता है.."
उसने भी अपनी आँखें चौड़ी कर लीं...और थोड़े भारी स्वर में बोली.." हाँ कुछ अजीब अजीब सा लगता है...सामने वाले को देख के हमको पता चल जाता है...कि वो मेरे बारे में क्या सोच रहा है...और कुछ भी गलत-सलत लगता है...तो मन करता है...उसको खूब मारें....कभी कभी तो जो भी हाथ में आता है...वही चला देते हैं.."

वो आदमी राजीव से बोला.."देखिए हम कह रहे थे ना...इनके ऊपर साया  है..बड़ा पूजा करवाना होगा...मुर्गा कटवाना होगा...चलिए हम लड़की को देख लिए...सब समझ गए...अब हम तंत्र मन्त्र से सब ठीक कर देंगे...अब चलिए इहाँ से ई साया इस से कुछ भी करवा लेगा.."
वो मन ही मन हंस पड़ी..'डर गया है...वो तांत्रिक..'
"अरे रुकिए..."..राजीव कहते रह गए पर वो आदमी अपने चेलों के साथ उठ  गया. राजीव को भी जाना पड़ा...बच्चों से मिलने का तो बहाना था..पर इसे भी अच्छा हथियार बनाया राजीव ने..अक्सर उनसे मिलने के बहाने , किसी ना किसी ओझा-गुणी को लेकर आते और हर बार उसे नए पैंतरे अपना कर उन्हें भगाना पड़ता. 

ये उपाय कारगर ना होता देख,उन्होंने एक नया तरीका अपनाया. एक रात जीप उसके दरवाजे पर रुकी. राजीव ने दरवाज़ा खटखटाया. वो खिड़की से राजीव की जीप देख चुकी थी. असमंजस में पड़ गयी अगर दरवाज़ा नहीं खोलती है तो पता नहीं क्या हंगामा करें. महल्ले वाले भी डिस्टर्ब होंगे. माँ भी जाग रही थीं...उनसे ही दरवाज़ा खोलने को कहा. और  बोली ..".. बाहर बरामदे पर ही रोक देना और कह देना..बच्चे सो गए हैं..."
पर खिड़की से उसने देखा..उनका चपरासी दो सूटकेस उठाये राजीव के पीछे -पीछे आया और बाहर बरामदे में सूटकेस रख दिया. ये माजरा कुछ समझ नहीं आया और वो बाहर निकल आई . राजीव अपने चपरासी से कह रहे थे, "अरे, ये यहाँ क्यूँ ले आए...??"
मुहँलगा चपरासी बोला.."सर आपका घर है ये.....आपके बीवी बाल-बच्चे यहाँ हैं तो आप कहाँ जायेंगे?...आप क्यूँ गेस्ट हाउस में ठहरियेगा.?..यहाँ अपने बच्चों के साथ रहिए " 
"ठीssक   है..अब तुम ऐसा कहते हो तो यही सही..रख दो अंदर सूटकेस..." सारे जाल राजीव के रचे हुए थे..पर वे अनभिज्ञता दर्शा रहे थे. 
वो गुस्से से भर उठी..एकदम सख्त आवाज़ में बोली.."खबरदार जो अंदर कदम रखा  है...ले जाओ सूटकेस..और अब आप भी मेरे घर में नहीं आ सकते...कोर्ट में फैसला होने दीजिये...जब तक कोर्ट से निर्देश नहीं मिलते...अब आप बच्चों से भी नहीं मिल सकते...बच्चों से तो आपको कभी मिलना ही नहीं था...हर बार  उनका बहाना बना कर नई चाल, चलते रहे.....अब आप इस घर में कदम नहीं रखेंगे.." अंदर से डर भी रही थी...कहीं राजीव भी चिल्लाने ना लगें...पर ड्राइवर और चपरासी की उपस्थिति में वे अपनी फजीहत नहीं करवाना चाहते थे. उसका रौद्र रूप देख वो भी समझ गए थे..'वो चुप नहीं रहेगी'
"हाँ ठीक है...अब कोर्ट में ही फैसला  होगा..एक पैसा नहीं देंगे...रोड पर भीख ना मंगवाए तब कहियेगा.." फुफकारते हुए  वे वापस चले गए. 

बाद में एक रात चपरासी ने उसे फोन करके  कहा.." आप मेरे साहब के साथ जो कर रही हैं...ये अच्छा नहीं कर रहीं...भगवान इसका फल जरूर देगा आपको.."
उसकी सहनशक्ति जबाब देने लगी थी. उसने राजीव की पोस्टिंग वाले  शहर के डी.एम. को एक पत्र लिखा...और उसमें राजीव और उनके चपरासी की सारी करतूत बयाँ कर दी कि 'वे लोग अक्सर फोन करके उसे धमकाते हैं...उसका जीना मुश्किल कर दिया है."
राजीव को बुला कर पूछताछ की गयी , राजीव ने एक बार तो फोन करके अपनी सारी भड़ास निकाली पर उसके बाद उनके फोन आने बंद हो गए.

***

उसे एक बड़ी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का काम मिल गया था. माँ ने थोड़ी आपत्ति जताई पर उसने कहा...'एक तो उसके पास क्वालिफिकेशन नहीं है..अनुभव नहीं है...और पैसों की भी जरूरत है..वो ज्यादा चूजी  नहीं हो सकती.
जिंदगी फिर से ढर्रे  पर आने लगी थी...इसी दौरान कोर्ट से बुलावा आया.बच्चों को भी लेकर जाना था.

लेडी जज थीं...उन्होंने रूद्र और काव्या से अलग कमरे में काफी देर तक बात की. उसका मन काँप रहा  था..ऐसा ना हो वे बच्चों की कस्टडी राजीव को दे दें. (पर जज ने बच्चों से तरह तरह के सवाल कर के उनके प्रति राजीव के व्यवहार का पता कर लिया और फैसला  उसके हक़ में सुनाया. राजीव से ये भी कहा कि अगर बच्चों का सम्मान पाना है तो उनका मन जीतना होगा, उन्हें प्यार देना होगा...तलाक की सुनवाई अभी चलती रहेगी..फैसले पर इतनी जल्दी नहीं पहुंचा जा सकता पर तब तक एक निश्चित रकम बच्चों को और  जया को मिलती रहेगी. इस ऑर्डर को पढ़कर वकील ने कहा.."अब आगे जो भी फैसला हो पर ..राजीव किसी बच्चे को लेने की बात नहीं कर सकते."..एक बड़ा बोझ उसके दिल से उतर गया.

बाद में काव्या  ने बताया कि जज ने पूछा था कि क्या कभी पापा ने प्यार नहीं किया..कभी टॉफी -चॉकलेट नहीं दिया...?" स्पष्टवादी काव्या ने कह दिया कि "कहते थे बोलो मम्मी गन्दी है..तभी चॉकलेट दूंगा  "
जज ने बच्चों की परवरिश के लिए एक हर महीने  एक अच्छी  रकम देने का निर्देश दिया था. उसे शान्ति मिली कि आखिर अब उसका संघर्ष सफल हुआ..वो चिंतामुक्त हो जी  सकेगी. परन्तु  अभी इस व्यवस्था की खामियों से दो चार होना बाकी था. उसके वकील ने निर्देश दिया कि इस रकम में उनलोगों का भी हिस्सा है..कुछ अंश वे ले लेते. कुछ जूनियर  वकील ..को दिलवा देते. सबका हिस्सा देते उसके हाथ में आधी रकम भी नहीं पहुंचती. 

आखिर कुछ महीने बाद खुद उसने राजीव से कहा कि वे सीधा उसके पास  ही  वो  रकम भेज दिया करें. राजीव ने शर्त रखी कि वे महीने में एक बार हेड ऑफिस  में  मीटिंग के लिए आते हैं तो वो बच्चों के साथ आकर पैसे खुद ले लें . राजीव से मुखातिब होने की बात सोच कर ही उसकी रूह काँप जाती. पर बच्चों के लिए ये करना ही था. बच्चे भी सहमे से रहते.

गेस्ट हाउस में राजीव बिस्तर पर मसनद लगाए किसी महंथ की तरह लेटे रहते. वो बच्चों को लेकर सामने कुर्सी पर अपराधी की तरह सर झुकाए बैठी रहती. कचर कचर पान चबाते राजीव का एकालाप चलता रहता. "कुछ नहीं बनोगे तुमलोग..ई तुमलोग की माँ तुमलोग का जिन्नगी खराब कर दी है...बिन बाप के रहने वाले बच्चे का कहीं कोई पूछ है.?..तनिका लोग को पता चलने दो...कोई बात नहीं करेगा तुमलोग से...अकेले पड़ जाओगे एकदम...कुछ नहीं कर पाओगे जिंदगी में..एक चपरासी का नौकरी भी नहीं मिलेगा..."

वो पहले से जानती थी 'राजीव' को हमेशा एकतरफा संवाद ही पसंद है. वे घंटो अकेले बोल सकते हैं. उन्हें किसी से  बातचीत करते कभी नहीं सुना..ऐसा कभी नहीं होता था कि वे 'दो अपनी कहें' और 'दो किसी की सुनें'. पहले भी वे एकतरफा अपनी ढपली बजाते रहते और उनके जूनियर ऑफिसर उसपर 'हाँ.. हाँ' की थाप लगाते रहते. या फिर उनके सीनियर अफसर हों तो बस सुनायी देता..'जी सर..'... 'जी.. जी सर.." हाँ सर'.. "एकदम ठीक सर" 

यहाँ तो उन्हें पूरा मौका मिल रहा  था...ना तो वे लोग उठ कर जा सकते थे ना ही कोई जबाब दे सकते थे. वो कुछ कहती तो फिर झगड़ा बढ़ता और शायद वो पैसे देने से मना कर देते  फिर लगाते रहो कोर्ट के चक्कर. बाद में बच्चों का डरा चेहरा देख कर समझाती  'किसी के कहने से कुछ नहीं होता...बल्कि तुमलोग इसे चैलेंज की तरह लो और भी अच्छे से पढ़ लिख कर बड़े आदमी बन कर दिखाओ " 

राजीव अक्सर रूद्र को नुक्कड़ से पान लाने के लिए कहते. पीछे वो और काव्या रह जाती...राजीव का प्रलाप चलता रहता. एक बार काव्या की तबियत ठीक नहीं थी...वो साथ नहीं गयी. सिर्फ रूद्र साथ था. कुछ ही देर बाद राजीव ने रूद्र से पान लाने के लिए कहा...अब कमरे में सिर्फ वो और राजीव रह गए थे. उसका दिल किसी अनागत की आशंका से धड़क उठा. और आशंका गलत नहीं थी.. रूद्र के जाते ही राजीव उठे और दरवाज़ा बंद करने लगे...'अभी डिवोर्स हुआ नहीं है....अभी भी आप हमारी पत्नी हैं...पत्नी धरम निबाहिए "
किसी तरह वो राजीव  को धक्का देते हुए बाहर भाग आई. बुरी तरह हांफ रही थी. रूद्र को आते देखा तो खुद को व्यवस्थित किया...रूद्र ने पूछा.."यहाँ क्यूँ खड़ी हो माँ.."
"तुम्हारी राह देख रही थी..कि इतना देर क्यूँ लग रही है.."
रूद्र कुछ बोला नहीं...उसने जाकर पान राजीव को दे दिए.

इसके काफी दिनों बाद, एक बार फिर काव्या  नहीं जा सकी और रूद्र के साथ उसे ही  जाना पड़ा. रूद्र ने रास्ते में ही बोला.."माँ दस पान बनवा  कर ले चलते हैं...वरना वे मुझे फिर पान लेने भेज देंगे..."
रूद्र पान बनवाने चला गया और वो अपने बेटे को एकटक देखती रही....इतने कम समय में ही कितना बड़ा हो गया उसका बेटा और कितना कुछ समझने लगा,इस कच्ची  सी उम्र में ही.
(क्रमशः )

Friday, May 18, 2012

जीवन की ये तल्खियां...ये दुश्वारियां (कहानी --14 )


कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा .जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.  उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. पर ससुर को चिंताग्रस्त देख, उसने केस वापस ले लिया. ससुर के रिटायरमेंट के बाद...सास-ससुर...उसके साथ राजीव के पास ही आकर रहने लगे...राजीव के अत्याचार चलते रहे..उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर  गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि  उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया   है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया .और एक स्कूल में नौकरी कर ली ))

गतांक से आगे 





धीरे धीरे  शहर में बसे रिश्तेदारों को पता चलने लगा था...और वे जैसे उसके मरे हुए रिश्ते की मातमपुर्सी के लिए आने लगे थे...चेहरे पर थोड़ा दुख छिडके...आँखों में चिंता का सुरमा लगाए...आवाज़ में इतनी सहानुभूति  घोल कर बोलते कि उसका मन होता उनके मुहँ पर ही दरवाज़ा बंद कर दे. उसे खुद  की चिंता नहीं थी..वो तो यह सब मान कर चल रही थी...कि इन स्थितियों से दो चार होना ही पड़ेगा पर उसे चिंता  बच्चो की होती...वे लोग बच्चों को ऐसे घूरतीं..और इतनी दया दिखा, उनके सर पर हाथ फेरतीं..जैसे अनाथ हो गए हों वे . अब असलियत सबको पता चल गयी थी...कि कितने जुल्म सहे थे उसने....इन सबका भी खूब बखान करतीं.."ना ना....ई मारपीट सब शरीफ  घर में होता है कहीं..." "कैसा खानदान में जया का बियाह कर दीं...कुछ पता उता  लगाना था,ना " और फिर उसे ऐसी हिकारत भरी नज़रों से देखतीं जैसे अच्छा ससुराल ना मिलने में उसकी ही कोई गलती हो.
बातों बातों में ये भी कह जातीं..'बच्चों के लिए तो सब सहना ही पड़ता है...'..औरत का तो जनम ही त्याग के लिए होता है'...मानो, उसने अपने सुख-चैन के लिए बच्चों से उनके ऐशो-आराम की जिंदगी छीन  ली हो. उसे डर लगता...बच्चों के कच्चे  दिमाग में ये सब बातें जायेंगी..तो सच में कल को वे उसे ही ना दोषी समझने लगें...भावनाओं को भी लोग भौतिकता के तराजू पर ही तौलते हैं. रोज बच्चे हिंसा के  शिकार हों...या फिर अपनी आँखों के सामने हिंसा घटित  होते हुए देखें...समाज को सब मंजूर होता है..दो रोटी, तन ढंकने को कपड़े और सर पर छत की एवज  में.

बहनें भी मिलने आयीं...पर थोथी सहानुभूति के लिए नहीं...उनका मन सचमुच व्यथित था...अपनी सामर्थ्य भर सहायता करने की भी कोशिश की. उसकी सीमा दी के दो बेटे ही थे...उन्होंने कह दिया.."'काव्या' की पूरी जिम्मेवारी मेरी,मेरी कोई बेटी नहीं...अब ये मेरी बेटी है.....उसकी पढ़ाई-लिखाई..कपड़े लत्ते सब मैं खरीदूंगी..." और उसे बुरा ना लगे...इसलिए यह चुहल भी की..'देखना..कन्यादान भी मैं ही करुँगी...फिर तुम अपना हक़ मत जताने लगना '
वो हंस कर रह जाती. 
सीमा दी ने काव्या के लिए नई फ्रॉक..जूते...हेयरबैंड सब ख़रीदे और साथ में रूद्र और सौम्या  के लिए भी...ये तर्क देते हुए कि ये छोटे बच्चे क्या समझेंगे कि मौसी सिर्फ 'काव्या'  को ही प्यार करती है. वो समझ रही थी...सीमा दी उसकी मदद भी करना चाहती हैं...और उनकी ये भी मंशा है कि उसे पता भी ना लगे. 
बहनों को भी इतने दिनों बाद यूँ मायके में आकर रहना अच्छा लग रहा था. उसकी शादी के बाद ही माँ,भैया के पास चली गयी थीं...और बहनों का इकट्ठे यूँ इत्मीनान से कुछ दिन बिताना छूट ही गया था. जब सारी बहनें..शाम को छत पर या देर रात गए आँगन में चारपाई पर लेटे बातें करतीं तो लगता ये बीच के साल छलांग लगा कहीं दूर चले गए हैं...और उनके वही पुराने स्कूल-कॉलेज वाले दिन लौट आए हैं....जब किसी चीज़ की कोई चिंता फिकर नहीं थी...जिंदगी के डरावने अन्धकार से साबका नहीं पडा था...सबकुछ स्वच्छ ,सहज और सुन्दर लगता.....चाँदनी अपनी शीतलता से नहलाती हुई सी और ठंढी हवा सहलाती हुई सी लगती थी.

उसकी बहनें यही थीं तभी..कोर्ट से राजीव द्वारा फ़ाइल किए गए डिवोर्स के कागज़ात मिले. अब उसे भी एक वकील चाहिए था. रीता दी ने अपने जेठ से बात की जो एक क्रिमिनल लायर थे...उन्होंने फैमिली कोर्ट का एक वकील ठीक कर दिया. वकील के पास सारी बातें दुहराते हुए उसे फिर उसी अंगार पर चलने जैसा महसूस हुआ...जो पैर की जगह ह्रदय दग्ध करते जा रहे थे.पर सबकुछ बताना भी जरूरी था.. कोर्ट से तारीख मिलने का इंतज़ार करते दिन बीतने लगे . वकील ने बताया था .बच्चों को भी कोर्ट ले कर जाना पड़ेगा. अपने बच्चों के मासूम चेहरे देखती और एक ठंढी सांस निकल जाती उसकी...इतने छोटे बच्चों को जिंदगी का कितना क्रूर रूप देखना पड़ेगा. इस उम्र तक अब तक उसने कोर्ट का मुहँ नहीं देखा....और उसके ये नन्हे बच्चे...इतनी जल्दी जिंदगी की तल्खियों से दो-चार होने लगे. फिर मन को दिलासा देती...आँख खोलते ही तो इनलोगों ने जिंदगी का विकृत रूप ही देखा है...उसकी कोशिश तो ये है कि दुनिया का एक खुशनुमा रूप भी देखें वे.

दोनों भाइयों की भी चिट्ठी आती. उनलोगों ने फोन लगवाने के लिए कहा था...और उसके पैसे देने की पेशकश की थी. दोनों भाइयों ने इस बात को जोर देकर लिखा था कि...'माँ की उम्र हो गयी है..उन्हें चिंता लगी रहती है...फोन होगा तो उनका हाल-चाल मिलता रहेगा.' उसके मन में एक टीस सी उठी..सिर्फ माँ की चिंता..यहाँ वो तीन बच्चों को लेकर अकेली है...उसकी चिंता की बात नहीं करते?...क्या वे लोग अब भी यही समझते हैं कि उनलोगों ने उसकी शादी कर दी...अब वो राजीव की जिम्मेवारी है?...और अगर वो राजीव को अपनी जिम्मेवारी सौंपने से इनकार कर रही है तो फिर खुद अपना ध्यान रखे..?.' फिर सर झटक देती..'इतनी छोटी-छोटी बातें सोचेगी तो जीना मुश्किल हो जाएगा...आखिर फोन लग जाएगा तो फायदा उसे भी तो होगा. वो बाहर भी रहेगी तो अपने बच्चों का हाल-चाल लेती रहेगी. भाइयों को ये सब कहना नहीं आया होगा..वरना फोन उसके काम ही ज्यादा आएगा. 
और उसने माँ से कहा.."माँ पड़ोस वाले शर्मा जी से या फिर सिन्हा साहब के बेटे से कहती हूँ..सारी बातें पता लगा कर बताएँगे कहाँ क्या एप्लीकेशन देना है.."
माँ ने कुछ सोचते हुए कहा.."ना तू मत जाना..मैं ही कह दूंगी.."
वो गौर कर रही थी...कभी भी पड़ोसियों से कुछ कहना हो तो माँ के पैरों में कितना भी दर्द हो... कितनी भी थकान हो..खुद ही जातीं..उसे नहीं जाने देतीं...और उसे ये रहस्य समझ में आया. अब वो अकेली स्त्री है...पति को छोड़कर आई है. उसका यूँ पर-पुरुषों से बात करना ठीक नहीं...चाहे पुरुष पचास साल का अधेड़ हो या पच्चीस  बरस का जवान...अब उसके आस-पास उनका प्रवेश वर्जित है. माँ ने दुनिया देखी है...ऊँच-नीच समझती हैं...और नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी को लेकर कोई बातें बनाए. इन बातों का ध्यान आते ही..वो भी ज्यादा सजग रहने लगी...पहले रास्ते में आते-जाते जान-पहचान के पुरुषों से रुक कर दो बातें कर लेती थी...पर अब सर हिलाकर  बस नमस्ते कहती और जल्दी से आगे बढ़ जाती. पहले ही क्या कम मुसीबतें हैं कि वो कुछ और को न्योता दे. 

 वो सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम करती...फिर स्कूल जाती...स्कूल से आकर फिर बच्चों को पढ़ाना उनके काम....शाम होते ही बदन, थकान से टूटने लगता..पर नींद आँखों से कोसों दूर रहती. क्या फैसला करेगा कोर्ट? बच्चे कहीं उस से दूर तो नहीं कर  दिए जायेंगे?...रात में कई बार आँख खुल जाती...पसीने से नहा उठती..सपने में देखा होता....'रूद्र और काव्या को राजीव खींच कर ले जा रहे हैं..और वे दोनों बच्चे उसकी तरफ हाथ फैलाए रोये जा रहे हैं.' दोनों बच्चों को कलेजे से लगा लेती पर उसकी बाकी की नींद उड़ जाती. 

उसने निश्चय किया..उसे और पैसे कमाने होंगे...ये बताना होगा कि वो अपने बच्चों की देखभाल करने में सक्षम है. स्कूल में वो किसी से ज्यादा से बातें नहीं करती थी.एक पत्रिका या कोई किताब हमेशा हाथ में लिए होती. क्लासरूम में पढ़ा कर आती और स्टाफरूम में अपनी पत्रिका में सर छुपा बैठ जाती. फिर भी बाकी टीचर्स स्त्री-पुरुष दोनों..बात करने की कोशिश  नहीं छोड़ते..उनके तमाम सवालों के जबाब में उसने यही बताया था कि 'पति का ट्रांसफर एक छोटी जगह पर हो गया है, वहाँ अच्छे स्कूल नहीं हैं... इसलिए वो बच्चों को लेकर यहाँ है...घर में बोर होती है..इसलिए नौकरी कर रही है.' 
पर उन सबको कहीं ना कहीं से उसकी वास्तविक स्थिति की खबर थी...वे लोग बस उसे घूरते रहते....कोई जबाब नहीं देते. वो फिर से पत्रिका में सर गड़ा देती. 

एकाध पुरुष शिक्षक ने किताबों के सहारे ही दोस्ती बढाने की कोशिश की..."आपको किताबों-पत्रिकाओं का शौक है...मेरे पास बहुत सारी किताबें हैं...आपके लिए ला दूंगा"
"थैंक्स...पर मेरे घर में एक लाइब्रेरी सी ही है...पहले तो वो ही सारी पढ़ लूँ..."
"अच्छा...तो आप हमारे लिए ही ला दिया कीजिए..हमें भी पढ़ने का बहुत शौक है.." तू डाल डाल तो मैं पात पात के तर्ज पर वे कहते.
"बाबूजी की जमा हुईं किताबें हैं..माँ उनको लेकर बहुत पजेसिव है...किसी को नहीं देने देती...सो सॉरी "..वो उनकी सारी चालें निरस्त कर देती. पर भीतर से बेतरह डर जाती. अभी तो उसने नौकरी शुरू ही की है...कैसे सामना कर पाएगी राह में निरंतर आने वाले,इन झंझावातों का. 

प्रिंसिपल एक सहृदय महिला थीं. उनसे उसने  असलियत नहीं छुपाई थी. उन्होंने अफ़सोस भी किया था कि वे उसकी ज्यादा मदद नहीं कर पाएंगी,ज्यादा वेतन नहीं दे पाएंगी . क्यूंकि वो बी.एड. भी नहीं है...और उसके पास पढ़ाने का कोई अनुभव भी नहीं है...हाँ, वो चाहे तो उसे  कुछ  ट्यूशन  दिला सकती हैं. उस वक़्त तो उसने ट्यूशन के लिए हाँ नहीं कही थी...उसे लगा था...स्कूल के बाद ट्यूशन भी करने लगी तो अपने बच्चों को कब समय दे पाएगी? पर अब पैसों की वजह से उसने प्रिंसिपल साहिबा से बात करने की सोची. उन्होंने ट्यूशन दिलवाने का आश्वासन दिया और एक सुझाव दिया  कि एक प्रायवेट बैंक खुला है..उसमे वो चाहे तो नौकरी कर सकती है. अच्छे पैसे मिलेंगे "

एक दिन स्कूल के बाद उसे साथ लेकर गयीं और बैंक के चेयरमैन से मिलवा दिया. उसने उनसे साफ़ कह दिया कि उसके पास बैंक  से सम्बंधित कोई क्वालिफिकेशन नहीं है...उसे अकाउंट वगैरह रखने की कोई जानकारी नहीं है.

चेयरमैन  ने बताया कि उनके पास एक पोस्ट 'बिजनेस डील' की है. बैंक वाले पेड़ लगवाते हैं और दस साल का एग्रीमेंट होता है. फिक्स डिपोजिट की तरह. वो बतौर एजेंट काम कर सकती है. वे लोग,एक अपार्टमेन्ट  भी बनवा रहे हैं...जिसमे, उसे  फ़्लैट की डील करनी होगी. जमीन का लोकेशन दिखाने जाना होगा...इन्सटौलमेंट  की जानकारी देनी होगी. बुकिंग करनेवालों की फ़ाइल तैयार करनी होगी. बुकिंग करके रसीद वगैरह काटना..ये सारे काम उसके जिम्मे होंगे.

उसे खुद पर इतना भरोसा  था कि ये सब तो कर ही लेगी. वेतन की बात पर चेयरमैन ने कहा..वे बहुत ज्यादा तो नहीं दे पायेंगे..पर 'पांच  हज़ार' तक देंगे...और फिर उसका काम देखते हुए बढ़ा देंगे. मुस्कुराते हुए उन्होंने ये भी जोड़ा..'बैंक के कई कर्मचारियों की तनख्वाह इतनी भी नहीं है...वे उसे ज्यादा ही  दे रहे हैं.' एक बजे के बाद बैंक का काम संभालने की बात भी आसानी से  मान गए.

एक पल को उसका जी धक् से रह गया कहीं उसकी क्वालिफिकेशन...'उसका अकेले होना...उसकी उम्र और उसका चेहरा तो नहीं'. पर फिर मन को दिलासा दिया...'कोई नहीं..वो अपना काम इतनी मेहनत और ईमानदारी से निभाएगी कि अपने वेतन को सार्थक सिद्ध कर देगी.

दुविधा थी तो घर की. अब स्कूल के बाद उसे बैंक जाना पड़ेगा...बच्चे बिलकुल अकेले रह जायेंगे. पर उसके पास कोई चारा भी नहीं था. बच्चे कुछ जल्दी ही जिम्मेवार बन जायेंगे...पर मन को समझाया...बच्चों को माता-पिता के नाक-नक्श के साथ उनके सुख-दुख भी विरासत में मिलते  हैं. जब  माँ पर इतनी मुसीबतें टूट रही हैं, तो कुछ हिस्से के भागीदार बच्चे भी बनेंगे ही. 

 पर कुछ ही दिनों बाद उसे स्कूल की नौकरी छोडनी पड़ी. बैंक के बाकी कर्मचारी शोर मचाने लगे कि वो तनख्वाह उन जितनी या उनसे ज्यादा ही लेती है...पर काम आधे दिन ही करती है. जबकि सच्चाई ये थी कि उसका काम क्लाइंट के आने पर निर्भर था. किसी किसी दिन तो कोई भी काम नहीं होता. सुबह जाकर भी वो यूँ ही रजिस्टर भरती  रहती या टाइम पास करती. पर उसे उपस्थित रहना पड़ता. उनलोगों का कहना भी जायज था...वो कोई आपत्ति नहीं कर सकती थी. 

पर घर के खर्चे भी पूरे करने थे..उसने प्रिंसिपल साहिबा की सहायता से कुछ जगह ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया. बैंक से आकर चाय पीती...बच्चों से दो बातें करती और फिर ट्यूशन के लिए निकल जाती. उम्मीद थी कि मन से पढ़ाएगी..बच्चे अच्छा रिजल्ट लेकर आएँगे तो शायद लोग अपने बच्चों को उसके घर पर ही ट्यूशन के लिए भेजने लगें. पर अभी तो उसे खुद को एक अच्छे टीचर के रूप में स्थापित करना था. माँ पर भी काम का कुछ ज्यादा ही बोझ बढ़ गया था. वो भरसक प्रयत्न करती कि सारा काम करके जाए. पर तीन तीन बच्चों की देखरेख भी अपनेआप में एक काम ही था. जबकि रूद्र और  काव्या इन कुछ महीनो में ही जैसे कई साल बड़े हो गए थे. अपने बस्ते संभालते...घर साफ़ करके रखते...काव्या तो एक नन्ही माँ ही बन गयी थी....सौम्या के कपड़े बदल देती...उसे खाना खिला देती...उसे गोद में उठाये डगमग कर घूमती रहती. पर माँ का बडबडाना भी चालू रहता. वो समझती थी...माँ की ये उम्र अब बस माला फेरने और चारपाई पर आराम करने  की थी..पर वो भी क्या करे....क्या उसकी उम्र यूँ जगह जगह धक्के खाने की है?..तीन छोटे बच्चों की माँ है वो...और उनके बचपन पर निहाल होने की बजाय वो यहाँ -वहाँ भटक रही थी..पर  करे..क्या ...सबको अपने अपने हिस्से के दुख झेलने ही पड़ेंगे.

***
राजीव कुछ दिन तो शांत रहे...उन्हें लगा...पैसे भेजने की मनाही कर...डिवोर्स सरीखा बम उसके ऊपर फेंक दिया है...उसका वजूद चिथड़े चिथड़े हो जाएगा...और वो उलटे पैरों दौड़ती  हुई उनके शरण में पहुँच जायेगी. पर उसे यूँ अपनी जिंदगी की बागडोर अपने हाथों में लेते देख उनका प्लान मटियामेट हो गया. एक दिन कोर्ट से बुलावा भी आया. वो रूद्र और काव्या को लेकर गयी...राजीव पहले से ही अपने कुछ जूनियर्स के साथ मौजूद थे. वो  एक किनारे अपने वकील के साथ खड़ी हो गयी. रूद्र और काव्या उसका हाथ पकडे उस से चिपक कर सहमे से खड़े थे. काले कोट पहने...पान से होंठ रंगे...ब्राउन रंग की फ़ाइल थामे वकील अंदर-बाहर आ जा रहे थे. आते-जाते उसकी तरफ एक नज़र जरूर उछाल  देते सब. वो खुद में थोड़ी और सिमट जाती. उन वकीलों के  आगे-पीछे लोगों का हुजूम चल रहा था. कुछ फटे कपड़े..मैली धोती...टूटे चप्पलों में हाथ जोड़,उनकी गुहार लगा रहे थे..और वकील उन्हें झिडके  जा रहे थे.  वो बच्चों को ऐसे दृश्यों  से दूर रखना चाहती थी..पर विवश थी. 

करीब दो घंटे खड़े रहने के बाद....वकील ने भीतर से आकर बताया कि तारीख बढ़ गयी है. वे लोग चलने को हुए तो राजीव ने अपने पॉकेट से नोटों की एक गड्डी निकाली और बच्चों को दिखाते हुए बोली.."आओ ले लो..इसीके लिए इतना हैरान होके आए हो ना...पईसा चाहिए ना तुमलोगों को ?" इतनी देर से बच्चे खड़े  थे..राजीव ने एक बार हाल तक नहीं पूछा था उनका..और अब उनके सामने गड्डी लहरा रहे थे. बच्चे भी सब समझ रहे थे..उनकी आँखें जमीन  से लग गयीं. वे अपनी जगह से नहीं हिले तो राजीव ने कहा..'जाओ जाओ..माएँ के साथ जाओ...देखते हैं..केतना दिन खिलाती है तुमलोग को..मेरे पास ही आना पड़ेगा दौड़ के.."
वो बच्चों को खींचती हुई...बाहर निकल आई. 

जब भी अपने घर के सामने वाली उस सड़क से गुजरती...सायास अपनी नज़रें नीची रखती कि कहीं राजीव के उस घर पर नज़र ना पड़ जाए...जिसकी छत पर से पहली बार राजीव ने उसे देखा था और उसकी जिंदगी ही ख्वार कर डाली. अब उस घर में किरायेदार रहते थे. जबतक राजीव के साथ थी...कभी किरायेदार से उनकी कोई घनिष्ठता नहीं देखी.पर अब जरूर राजीव ने उनसे नजदीकियां बढ़ाई होंगी क्यूंकि उससे सम्बंधित हर खबर राजीव को पहुँच जाती. 

पहले तो उसकी बहनों के आने की खबर उन्हें मिल गयी और  राजीव उनके घर जाकर उनसे लड़ आए कि 'वे लोग तो सुख से अपने परिवार के साथ हैं...और उनके परिवार को बिखरने में मदद कर रही हैं. उसे समझाने के बजाय कि उसे अपने पति के पास चले  जाना चाहिए...उल्टा उसकी सहयता कर रही हैं. '. उनसे ये गुजारिश भी कर आए कि 'अब जया अगर उनलोगों के पास किसी मदद के लिए आए तो उसके मुहँ पर दरवाज़ा बंद कर दें..जिस से कोई सहरा ना पा..हताश हो..वो उनके पास लौटने के लिए मजबूर हो जायेगी"

बहनों ने उल्टा उन्हें ही आड़े हाथों लिया कि "अगर वे प्यार से जया को रखते तो ये नौबत ही क्यूँ आती...किसी अनजान के मुहँ पर तो वे लोग दरवाज़ा बंद कर ही नहीं सकतीं...अपनी बहन के साथ ऐसा कैसे करेंगी ?"

वहाँ  से निराश हो...अब  जिनके यहाँ ट्यूशन पढ़ाने जाती थी, राजीव ने  उनसे संपर्क किया और अपना दुखड़ा रोया कि "वो बच्चों के बिना बहुत दुखी हैं...किसी तरह पति-पत्नी का समझौता करवा दें" लोगों को महान बनने का बड़ा शौक होता है. उन महिला ने एक चाल चली...जब वो बच्ची को उसके कमरे में पढ़ा रही थी तो उसे बुलाया कि "आपसे कोई मिलने आया है...ड्राइंगरूम में बैठा है" 
उसे कुछ समझ नहीं आया..जाकर देखा तो सोफे पर राजीव बैठे मुस्कुरा रहे थे. वो सीधा दरवाजे से निकल गयी ..वो ट्यूशन भी हाथ से गयी. राजीव ने उसके दो और ट्यूशन भी यही कह कर छुडवा दिए कि आपलोग पैसे नहीं देंगे तो वो हारकर मेरे पास लौट आएगी. सबलोगों को अंदर की सच्चाई नहीं पता थी..और वे राजीव की बातों में आ गए. 

राजीव का झूठा अहम् यह गवारा नहीं कर रहा था कि वह उनकी छत्रछाया के बगैर...बिना उनकी कोई मदद लिए अपने बलबूते पर बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेवारी उठा रही है  . उनके पौरुष को यह एक बड़ी चुनौती थी और उसे वे  किसी भी तरह अपनी मदद का मोहताज देखना चाहते थे. रोते-गिडगिडाते....बच्चों का वास्ता देते  अपने पैरों पर गिरा देखना चाहते थे. राजीव वे जीव थे कि वे सिर्फ किसी को पैरों तले कुचल कर ही संतुष्ट नहीं होते थे . कुचला हुआ जीव , पैरों तले आधा दब कर बाकी के आधे हिस्से से उनके जूते चूमते रहे...उनकी तमन्ना ये होती थी.पर अब वो उनकी पहुँच से दूर उन्हें खुद को सताने का कोई मौका नहीं दे रही थी और ये बात उन्हें हकलान किए जा रही थी. 

एक दिन बैंक में उसके पास इंटरकॉम आया कि 'एक क्लाइंट आपसे बात करना चाहते हैं" हमेशा की तरह उसने कहा 'भेज दो' . वो रजिस्टर पर सर झुकाए कुछ लिख रही थी...किसी के गला साफ़ करने की आवाज़ से चौंक कर देखा तो सामने राजीव थे. एकबारगी उसकी नसें तन गयीं पर खुद को संभाला. बगल की कुर्सियों पर और लोग भी बैठे थे. उन्हें बैठने को कहा...और फिर एक आम क्लाइंट की तरह उन्हें पूरी योजनायें समझा दीं ' अब राजीव  की फरमाइश थी कि 'उन्हें लोकेशन देखनी है'...वो उठ कर चेयरमैन के पास गयी और कहा..." आज मुझे घर जल्दी जाना है..जरूरी काम है..आप किसी और को इनके साथ भेज दीजिये" 

उसके चले जाने के बाद..पता चला कि राजीव ने सबको बता  दिया कि वो उनकी पत्नी है और उनसे रूठ कर, उन्हें छोड़ कर चली आई है .उन्होंने चेयरमैन से भी रिक्वेस्ट किया कि...'उसे काम से निकाल दें'

दूसरे दिन  वो बैंक गयी तो पाया सबकी निगाहें बदली हुई हैं. सब उसे छुपी निगाहों से देखकर मुस्कुरा रहे हैं. तुरंत ही चेयरमैन का बुलावा आया और उहोने सारी बातें बता दीं...साथ ही ये अहसान भी जता दिया कि 'देखो तुम्हारे पति ने ये ये कहा...पर मैने बोला..'नहीं...मुझे उनके काम से कोई शिकायत नहीं तो मैं कैसे उन्हें निकाल दूँ..ये सब आपका निजी मामला है...मैं उसमे दखल नहीं दूंगा...आपसे कोई तो शिकायत होगी तभी आपको छोड़ कर चली आई..." फिर आवाज को मुलायम बना कर कहा.."क्यूँ जया जी....मैने ठीक किया ना"

वो सर झुकाए सब सुन रही थी...इस अचानक आवाज़ में घुले शहद  से चौंक गयी...किसी तरह कहा.."हाँ सर ठीक किया..थैंक्स.." और बाहर चली आई. 

ऑफिस  की महिलाएँ ..पुरुष सब किसी ना किसी बहाने ,उस से सहानुभूति जताने की कोशिश करते. पर वो उन्हें कोई भी जबाब ही नहीं देती. लंच टाइम में टेबल पर लंच करते हुए लोग तलाक  का कोई ना कोई किस्सा छेड़ देते...कि फलां महिला...अपने पति को छोड़ कर चली आयीं...या फलां पुरुष ने दूसरी शादी कर पहली पत्नी को घर से निकाल दिया...वो सब समझ रही थी..सब बहाने से जानना चाहते थे कि उसके पति को छोड़, अकेले रहने का क्या कारण था?...एक पचपन वर्षीय अधेड़ वयी सक्सेना जी हमेशा  ललाट पर लाल टीका लगाए रहते और बात बात पे 'जय माँ काली' कहते रहते...

एक दिन कहने लगे..'क्या जमाना है...आजकल  पति-पत्नी साथ  नहीं रहना चाहते और मुझे देखिए दो साल हो गए श्रीमति जी को परलोक सिधारे पर मैं आज भी उनकी फोटो अपनी उपरी जेब में लिए घूमता हूँ कि वे मेरे दिल के करीब रहें ". उन्होंने तुरंत फोटो निकाल कर उसे भी दिखाई. और फिर ठंढी सांस भर कहने  लगे.."श्रीमती जी के जाने के बाद तो मैं सारा ध्यान पूजा-पाठ में लगाने लगा हूँ. सुबह दो घंटे और शाम को चार  घंटे ध्यान लगाता हूँ. इतना ध्यान करने से अब तो मुझमे इतनी शक्ति आ गए है कि मन्त्र पढ़ कर किसी पर फेंक दूँ तो वो मर जाए....किसी की आँख में पांच मिनट देखता रहूँ तो वो मेरे आगे-पीछे घूमने लगे..पर मैं ये सब करता नहीं...मैं तो बस माँ की भक्ति  में मगन रहता हूँ... बस किसी का कुछ भला हो जाए, मेरे हाथों..यही सोचता हूँ...क्यूँ तिवारी जी...उस दिन देखा था,ना उस बच्चे को कितना बुखार था..मेरे हाथ फेरते ही आँख खोल दिया....".

"हाँ महराज..बहुत शक्ति है इनके हाथ में...अपने चेयरमैन साहब भी...काली के बड़े भक्त हैं...हम तो बस आप सबके संगत से ही पुण्य कमा लेते हैं."..ये तिवारी जी थे.

वो सब सुन रही थी पर इस बातचीत का औचित्य नहीं समझ पा रही थी...पर बहुत जल्दी ही इस बातचीत का राज़ पता लग गया. अब सक्सेना साहब अक्सर किसी ना किसी काम से उसे फोन करते पर फोन करने के पहले...फोन में दो तीन  बार फूंक मारते....पहले उसे लगा...शायद उनका फोन खराब है...आवाज़ नहीं जा रही...पर जब रोज का सिलसिला हो गया..वो भी दिन में तीन बार...तो उसे खटका हुआ. एक  ऑफिसर  थीं मंजू दी...वो उस से बहुत स्नेह रखती थीं. उसने उनसे ये सब कहा तो हंसने लगीं,कहने लगीं.."तुम पर वशीकरण मन्त्र आजमा रहे हैं..." फिर उन्होंने गंभीरता से सलाह दी..तुम सबके सामने,ये सब  कह दो..फिर आगे मैं संभाल लूंगी. 

और उसने सबके सामने टोक दिया.."सर, आपका फोन खराब है क्या...बदलवा क्यूँ नहीं लेते....कुछ भी कहने से पहले आपको फूंक मारना पड़ता है"
"ऐसा तो नहीं है...हमलोग से तो ठीक से बात होती है...फोन खराब तो नहीं लगता...क्यूँ सक्सेना जी?"..मंजू दी जल्दी से बोलीं.
वे कुछ बोलते कि मंजू दी खुद ही आगे बोल पड़ीं...."सक्सेना साहब आप कोई मन्त्र तो पढ़ के फूंक नहीं मारते.??..बड़े भले आदमी हैं बेचारे...तुम्हारे अच्छे के लिए करते  होंगे...पर ये नए जमाने के लोग बड़े अजीब  हैं...विश्वास ही नहीं है इनलोग  को पूजा-पाठ की शक्ति पर...किताब पढ़ पढ़ के दिमाग खराब  हो गया है...क्यूँ जया तुमको भी विश्वास नहीं है ना?

उसने 'ना' में सर हिला दिया...और मंजू दी बोलीं.."देखिए आपने अपनी कितनी शक्ति व्यर्थ कर दी...इसको विश्वास ही नहीं तो कहाँ से असर होगा.." चलो चलो कितना काम पडा है ...अब सर नहीं आजमाएंगे कुछ भी."
उन्हें कुछ बोलने का अवसर दिए बिना..वे दोनों अपनी सीट पर चली आयीं. रजिस्टर में सर छुपाये देर तक बेआवाज़ हंसती रहीं ,उसका तो ऐसे हँसते हँसते पेट दर्द होने लगा.

पर उसकी परेशानी कम  नहीं हुई थी.एक दिन एक दूसरे सज्जन सिंह साहब ने अपने केबिन में बुलाया और पूछा..." कितना पैसा देते हैं ये लोग?"
उसके बताने पर कहने लगे.."पता है..इतने काम का ही दिल्ली- बम्बई में कितना मिलता है?? बीस-पच्चीस हज़ार. हमको एक ऑफर है...हम तो ज्वाइन करने का सोच रहे हैं...उसी ऑफिस में एक जगह और खाली है....आपके लिए बात करें..चलियेगा? "
"सोच कर बताउंगी..सर" कहती वो बाहर चली आई...अब इनसे कैसे निबटा जाए. फिर से मंजू दी ही काम आयीं. उनकी सलाह पर दूसरे दिन खुद ही उनसे जाकर बोली..."बहुत बढ़िया ऑफर है सर....आप मेरे लिए भी बात कर लीजिये....मेरे तीनो बच्चे और माँ सबका रिजर्वेशन करवाना होगा..कब चलना होगा?"
सिंह साहब के चेहरे का रंग उड़ गया था...उन्होंने गंभीरता से कहा..."बात करके बताऊंगा..." और फिर दुबारा उस से मुखातिब नहीं हुए.

राजीव ने अब उसे परेशान करने  की दूसरी तरकीब निकाली. अक्सर छुट्टी लेकर उसके शहर  आ जाते और ऑफिस के नीचे चाय के दुकान में बैठे रहते. लोगों  से उसके आने-जाने का समय पूछते रहते. ऑफिस का कोई दिख जाता...तो सुना कर कहते.."अब किडनैप ही करवाना पड़ेगा...दूसरा कोई रास्ता नहीं है...इहाँ नौकरी कर के मेरी इज्जत मिटटी में मिला रही हैं..."

लोग आकर उसे बता जाते...डर तो लगता उसे...पर फिर सोचती...इतनी हिम्मत नहीं है राजीव की...कोर्ट में केस दाखिल है....कुछ करेंगे तो उनकी नौकरी पर बन आएगी. "

ऑफिस में चाय पहुंचाने वाले एक छोकरे को पैसे देकर,राजीव ने  ऑफिस में छोटे छोटे पत्थर भी फिंकवाने शुरू कर दिए. कभी किसी खिड़की से तो कभी किसी खिड़की से पत्थर आते..कभी किसी के हाथों में लगते..कभी किसी कि गर्दन पर. खिड़की से  झांकने पर कोई नज़र नहीं आता. पर एक दिन  तिवारी जी ने उस लड़के को पकड़ लिया ...और उसके कान उमेठ कर दो चपत लगाए   तो उस लड़के ने राजीव की डीलडौल..उनके कपड़ों का वर्णन  कर बता दिया कि उन्होंने उसे पैसे दिए थे. लड़के को तो पुलिस का भय दिखा कर भगा दिया गया....पर तिवारी जी अब खुद को ऑफिस का हीरो और उसका संरक्षक समझने लगे. अक्सर कहते  "डरियेगा  नहीं..जया जी...मैं हूँ..ना..सब ठीक कर दूंगा...एक हाथ लगाया उसको कि उस लड़के ने सब बक दिया....मेरे  रहते आपको कोई तंग नहीं कर सकेगा.."

उसे बहुत उलझन होती इन बातों से पर थैंक्स कह कर सर झुका लेने के सिवा कोई उपाय भी नहीं था. चेयरमैन के कानों तक बात गयी. उन्होंने भी बुलावा  भेजा...और फिर अहसान जताने लगे..."देखिए आपकी वजह से ऑफिस में कितना कुछ हो रहा है....फिर भी मैं आपको कुछ नहीं कहता..मैं आपको समझता हूँ...सब समझते हैं...कि आपके लिए बहुत हाइ रिगार्ड्स हैं मेरे मन में...देखिए लेटर सब पर आप ही साइन करती हैं ना...लोग के पास लेटर जाता है..तो लोग समझ जाते हैं...आपको हम कितना मानते हैं...कितना पावर दिए हुए हैं,आपको?...आप समझ रही हैं ना...आपके लिए कितना मान..कैसी भावनाएं हैं मेरे मन में..??"

उसक पूरा शरीर स्टिफ हो गया था...हाथों की नसें तन गयी थीं. मुट्ठियाँ भींचे नज़रें झुकाए वो चुप रही तो वे आगे बोले..."आप देख रही हैं..ना कितने भगवान लोग का फोटो लगा हुआ है...हम काली, दुर्गा सबकी पूजा करते हैं..ये हाथ में कड़ा जो पहने हैं ना...ये काली जी का आशीर्वाद है...इस कड़ा में ये शक्ति है कि ये सामने वाले के मन में क्या चल  रहा    है...हमको सब बता देता है..."

फिर उन्होंने कड़ा...अपने कान के पास ले जाने का अभिनय किया और थोड़ी देर बाद बोले.."ये कड़ा कह रहा है...आपके मन में मेरे लिए भी वही भावनाएं हैं...आप भी मेरे लिए वही सोचती हैं...जो मैं आपके लिए सोचता हूँ..."

अब वो चुप नहीं रह सकी, बोली.."सर..शायद इस  बार कड़ा ने आपको सच नहीं बताया...मेरे मन में आपके लिए कोई भावना नहीं है...बस आप मेरे बॉस हैं और मैं आपकी कर्मचारी..इस से ज्यादा कुछ नहीं.."

चयरमैन का भतीजा ,इसी बैंक में वाइस चेयरमैन था. युवा लड़का था...मेहनत से अपना काम करता...और अपने काम से काम रखता...उसने कभी उसके साथ कोई अनाधिकार चेष्टा नहीं की..उसके साथ बहुत ही  इज्जत से पेश आता था.  चेयरमैन की बार बार की हरकतों से वो इतनी दुखी थी और उस दिन ,इतने रोष में आ गयी थी कि सीधा उस लड़के के  केबिन में गयी....और चाचा जी की शिकायत कर डाली. भतीजे ने उसे बिठाया..पानी पिलाया..और कहा, 'ऑफिस में किसी और से इसकी चर्चा ना करें....वो अपने चाचा से बात करेगा.'

दूसरे दिन ऑफिस आते ही  चेयरमैन ने उसे अपनी केबिन में बुलाया और एक कागज़ सामने कर दिया..कहा साइन कीजिए.

उस कागज़ में लिखा था..."अब बैंक को उसकी सेवा की जरूरत नहीं रही...उसकी सेवा समाप्त की जाती है"


उसके पैरों तले जमीन खिसक गयी. स्कूल की नौकरी छोडनी पड़ी थी...ट्यूशन छूट गए और अब ये नौकरी भी नहीं रही....आँखें डबडबा आयीं पर फिर उसने खुद को साध. नज़रें उठाईं...पहले सामने ही दीवार पर लगी...काली जी की तस्वीर पर नज़र गयी...और ह्रदय में एक  विश्वास का नन्हा अंकुर उग आया.."माँ ने जरूर इस से कुछ अच्छा ही उसके लिए सोच रखा होगा...ये जगह उसके लिए नहीं थी..." और उसने सीधी चेयरमैन की नज़रों में देखते हुए कहा..थैंक्यू सर" 

और बाहर निकल आई. एक अन्य कर्मचारी उसके सामने एक रजिस्टर लेकर आया....जिसमे लिखा था 'उसकी सेवाओं से संतुष्ट नहीं है' ,और उसे साइन करना  था.....कि 'उसपर बैंक का कोई बकाया नहीं है'. 

वह कुछ देर अपमान का घूँट पीती रही .फिर एक स्वाभिमान की लहर शिराओं में दौड़ पड़ी....और उसने रजिस्टर में लिख दिया...." मुझे इस बात की ख़ुशी है कि यहाँ ऑफिस से  मुझे कार्य के प्रति अयोग्य घोषित कर निकाला जा रहा है जबकि मैने पूरी लगन से अपने कार्य को अंजाम दिया है. पर यहाँ उन्हीं महिलाओं को योग्य माना जाता है जो वरिष्ठ अधिकारियों की हाँ में हाँ मिलाती हैं...और उनके साथ कहीं भी जाने को तैयार रहती हैं" 

इतना लिख कर वो बाहर निकल आई. बाद में पता चला...इसे पढ़कर दो,तीन महिलाओं ने वहाँ की नौकरी से इस्तीफा दे दिया.

अब फिर से उसके सामने एक सीधी सपाट सूनी सी सड़क थी...जहाँ किसी दरख़्त की छाया  भी नहीं थी....उसे ही कोई पड़ाव ढूँढना था. 

(क्रमशः) 

Saturday, May 12, 2012

बीच धार में डगमग करती जीवन कश्ती (कहानी --13 )

कहानी अब तक 

(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा .जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका  बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए. चार दिन के बेटे को उस से छीन उसे घर से निकाल दिया. उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. ससुर उसे अपने साथ ले गए. पर ससुर को चिंताग्रस्त देख, उसने केस वापस ले लिया. ससुर के रिटायरमेंट के बाद...सास-ससुर...उसके साथ राजीव के पास ही आकर रहने लगे...राजीव के अत्याचार चलते रहे..उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..देवर की शादी के बाद..देवरानी का व्यवहार देख...सास-ससुर को जया का महत्व पता चला...पर राजीव नहीं बदला...जया गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर  अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी  होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी की उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया  है))

गतांक से आगे 


घर आकर उसने जरा भी देरी नहीं की सामान समेटने में. ये तय कर लिए था..बस बच्चों के कपड़े...उनकी किताबें ..खिलौने...और अपने कपड़े के सिवा और कुछ छुएगी  भी नहीं. पता नहीं कहाँ की स्फूर्ति..भर गयी थी  तन मन में. अभी दोपहर तक मन इतना अवसादग्रस्त रहता था कि किसी तरह शरीर को खींच कर बस जरूरी काम भर निबटाती थी. अपने लिए एक ग्लास पानी भी लेना हो तो दस मिनट तक यूँ ही बैठी रह जाती थी..कई बार तो पानी पीना भी टाल ही जाती थी .पर अभी तो सारे कमरे में उनके कोने कतरे में हर जगह से सामान समेट रही थी. बच्चे भी खेलकर आए तो चौंक गए.."माँ हमलोग कहीं जा रहे हैं?'
"हाँ..नानी के यहाँ..." वह बच्चों को  मानसिक रूप से तैयार कर देना चाहती थी.
"अहा..मैं तो कित कित खेलूंगी छत पे..".
"मैं तो छत पर पतंग उड़ाऊंगा..."
बच्चे ज्यादा दिन के लिए कभी ननिहाल गए नहीं...बस दो बार सप्ताह भर के लिए गए थे...उन्हें वहाँ की छत का बड़ा आकर्षण था. अब तक जहाँ भी रहे...सरकारी क्वार्टर्स में छत नहीं थे...इसलिए बच्चों को बड़ा अजूबा लगता था,वहाँ. 
वह खाना  बनाने में लग गयी...बच्चे अपनी कल्पनाओं के किले बनाने में .

दूसरे दिन बच्चों के स्कूल गयी...संयोग अच्छे थे कि बच्चों के रिजल्ट आए और नए क्लास में गए कुछ ही दिन हुए थे...वहाँ  प्रिंसिपल से बात की कि यहाँ अकेले बच्चों के  साथ रहना मुश्किल हो रहा है...इसलिए वे बच्चों को यहाँ से लेकर जाना चाहती हैं..और उन्हें स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट चाहिए. दो दिन में सारे जरूरी कागजातों के साथ उन्होंने लिविंग सर्टिफिकेट देने का आश्वासन दिया. 

शाम तक माँ और भैया भी आ गए.
माँ घर में घूम घूम कर उसकी तैयारी देखती रहीं...और पूछ बैठीं.."तुमने सचमुच  तय कर लिया है..??"
"हाँ माँ...अब मेरा फैसला बदलने वाला नहीं.."
"पर ऐसा हुआ क्या...??"
"क्या तुम्हे नहीं मालूम है??...उन सबको  दुहरा कर...किस्से सुना कर क्या होगा,...तुम्हे अगर नहीं दिखता तो कितने भी किस्से सुना दूँ..नहीं दिखेगा..सीमा दी..सिर्फ मुझे नज़र भर देख कर ही मेरी हालत समझ गयी थी...वो सब जाने दो, माँ...वर्णन करने से कोई फायदा नहीं...और तुम मेरी हिम्मत नहीं बन सकती हो तो मुझे अब डराओ मत.....बड़ी मुश्किल से मैने हिम्मत जुटाई है..मुझसे ज्यादा सवाल मत करो माँ..डर है मैं फिर से बिखर ना जाऊं कहीं.."
"बेटा..हम तुम्हारे दुश्मन नहीं हैं...तुम्हारी भलाई के लिए कह रहे हैं..."
"भैया से पूछती हूँ..चाय लेंगे क्या...तुम्हारे लिए भी बना दूँ?..."..कहती वो वहाँ से चली गयी...माँ से बातें करने का कोई मतलब नहीं था...वे हर संभव कोशिश करतीं कि वो अपनी जिद छोड़ दे.

भैया भी तो आए थे... तब से माथे पर हाथ रखे गुमसुम बैठे थे,  जैसे उनके ही सर पर जाकर रहने वाली थी  . मन हो रहा था, जाकर कह दे.."भैया...चिंता ना करो...चाहे कुछ भी हो..आप पर बोझ नहीं बनूँगी...ना तो आपको अपनी किसी तकलीफ  में  कष्ट दूंगी..." पर फिर सोचती...'किसी भी भाई को दुख तो होगा ही ना...चिंता होगी ही...और भैया ने तो माँ की तरह इतना डिटेल में कभी सुना भी नहीं कि क्या क्या गुजरती रही है..उस पर...फिर भी  उन्हें अंदाज़ा तो है,ना...तो उसके इस निर्णय से इतने परेशान क्यूँ दिख रहे हैं ?"

जब चाय लेकर गयी तो भैया ने इतना ही पूछा..."राजीव जी के आने के बाद ही जाओगी ना.."
"हाँ भैया...मैं कोई चोरी-छुपे नहीं जाना चाहती...मैं उन्हें बता कर जाउंगी...उनके सामने जाउंगी..." कहना चाहती थी..'कई  बार उन्होंने निकाला है  घर से...पर अब वो खुद उनके सामने उनका घर छोड़ कर जाना चाहती है.' पर भैया का ग़मगीन चेहरा देख...कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई.
लेकिन राजीव के आने के बाद जाने की  बात सुनते ही भैया...सीधा होकर बैठ गए..'जैसे उन्हें उम्मीद की किरण नज़र आ गयी हो..कि शायद उनके आने पर बात बन जाए"
भैया  उत्साह में भर कर बोले..."मैं उनकी पोस्टिंग पर जाकर उनसे मिल आऊं?"
"नहीं..बिलकुल नहीं..कल शनिवार है..वे आ ही जायेंगे . तब जो कहना हो कह लीजियेगा.." वो राजीव को पहले से संभलने का कोई मौका नहीं देना चाहती थी..पता नहीं कौन सी चाल चल देते और भैया को कौन सा पाठ पढ़ा देते. 
भैया ने फिर से निढाल हो...कुर्सी की पीठ से सर टिका दिया. एक बार उनकी हालत देख,उसका मन भर आया...उसकी वजह से कितने परेशान हैं वे...पर दूसरे ही पल ख्याल आ गया...और उसने जो इतने साल ,पल पल जो कुछ भी झेला है,उसका क्या ..फिर सर झटक दिया..अब ये सब सोचने का वक़्त नहीं है...उसे कितना कुछ संभालना है.

***
घर के अंदर कदम रखते ही राजीव की नज़र भैया और माँ पर पड़ी...एक पल को तो उनकी भृकुटी चढ़ गयी. पर दोनों को गंभीर बने सर झुकाए देख..उन्हें कुछ आभास हो गया. एकदम से पैंतरा बदल कर बोले.."अरे! आपलोग कब आए..एकदम अचानक.." और उनके पैरों पर झुक गए. माँ तो एकदम गद गद हो गयीं...उड़ती नज़र से उसे भी देख लिया..जैसे कह रही हों..'तुम्हे क्या शिकायत है...इतना संस्कारी तो है.."..उसने नज़र घुमा ली.
भैया ने अस्फुट से स्वर में कहा.."कल आए हमलोग...."
फिर राजीव उसकी तरफ मुड कर बोले.."अरे! किसी से खबर करवा देतीं..हम कल्हे चले आते...'
इस बार भैया ने सर उठा कर उसकी तरफ  देखा...जैसे कह रहे हों...सबकुछ तो इतना सहज है...फिर वो ऐसा फैसला क्यूँ ले रही है.."
"जरा चाय वाय पिलाइए....और कुछ खिलाई हैं कि नहीं भैया को...पकौड़ी  बनाइये तनिका.." राजीव उसे वहाँ से टरका देना चाहते थे...ताकि उसके पीछे में भैया, माँ से बातें कर सकें. इन दोनों की मुखमुद्रा से जो मजबूरी झलक रही थी...इसका उन्हें खूब आभास हो गया था.
पर अब वो उनकी कोई चाल कामयाब नहीं होने देने  वाली थी. दोनों हाथ सामने बांधे ..सतर खड़ी हुई वो राजीव की आँखों में सीधा देखते हुए बोली.." मैं इन्हें यहाँ बुलाया है..और अब मैं...घर छोड़ कर जा रही हूँ,हमेशा के लिए.."
"आएँ..का कह रहीं हैं आप.."...राजीव ने कुछ ना समझने का नाटक किया.
"मैं अब बच्चों के साथ आपका घर हमेशा के लिए छोड़ कर जा रही हूँ.."..एक एक शब्द पर जोर देते हुए वो बोली.
"ई का गज़ब कह रही हैं..भाई...का हो गया..." राजीव खड़े होकर  उसकी तरफ बढे.
वो दो कदम पीछे हट गयी....और बोली..."जो सब होता रहा है...आप भी जानते हैं..हम भी और मेरे माँ और भैया भी...वो सब दुहराने का कोई मतलब नहीं है..."
अब राजीव माँ और भैया की तरफ मुड़े..."आपलोग समझाइये ना इन्हें...ई का कह रही हैं..माथा घूम गया है का इनका...हमको बच्चों से अलग कर देना चाहती हैं.."

मन हो रहा था....काव्या को उठा कर फेंकने वाली...सौम्या का इलाज नहीं करवाने वाली..सारी बातें कह कर पूछे कि आपको कितना प्यार है बच्चों से? पर उसे पता  था...राजीव सफाई देने लगेंगे और माँ-भैया भी उसका जस्टिफिकेशन ढूँढने लगेंगे...और कहीं से उसकी गलती ही निकाल देंगे...राजीव के हाथ उठाने की बात को कितनी बार ये लोग...छोटी सी बात ठहरा..रफा-दफा करते हुए  कह चुके थे.."ऊ ब्लडप्रेशर  बढ़ जता है..हर आदमी..बर्दास्त नहीं कर पाता है...' 

जब एक बार माँ को बताया कि गलती से उसने पांच की जगह चार रोटी दे दी थी..और राजीव ने थाली उठा कर फेंक दी थी कि उसको आधा पेट खिलाना चाहती है' तो माँ का तर्क था..'ऊ ग़लतफ़हमी हो गया ना उनको...उनको लगा कि तुम जानबूझकर चार रोटी  दी हो' 

माँ को ये नहीं लगा कि वे एक रोटी और मांग भी तो सकते थे..तो इनलोगों के सामने कुछ भी कहने से क्या फायदा...बस तमाशा ही होगा. वो चुप रही तो राजीव का नाटक और बढ़ गया..."अब तनी मनी कहा सुनी कौन मियाँ-बीवी में नहीं होता है...इसका मतलब ई थोड़े ही है कि घर छोड़ दिया जाए..जाइए जाइए माथा ठंढा कीजिए..और चाय बनाइये"
"हम ठंढे माथे से ही ये निर्णय लिए हैं...और अब आपके साथ रहना मेरे बस की बात  नहीं है..."
माँ ..भैया तो सर झुकाए बैठे ही थे...राजीव भी सर पकड़ कर बैठ गए...वो अपराधिनी सी खड़ी थी..जैसे उसने ही इनलोगों को कोई बड़ी सजा सुना  दी हो.
थोड़ी देर में राजीव के कंधे हिलने लगे...और वे सुबुक सुबुक कर रोने लगे...जैसा तब रोते थे जब उनपर पुलिस केस हो गया था..
माँ हडबडा कर अपनी जगह  से उठीं.."अरे मेहमान का होगया..ऐसे मन छोटा मत कीजिए.."
अब ये सब देखना उसके बर्दाश्त के बाहर हो गया. वो वहाँ से हटकर अपने बच्चों के पास चली आई..
थोड़ी देर बाद माँ आयीं..."अरे चाय नहीं बनाई ?..मेहमान का माथा दुखा रहा है..."
उसने चुपचाप चाय बना कर दे दी.

जब रात में माँ ने फिर से समझाने का प्रयास किया तो उसने राजीव की वो सारी हरकतें बता  दीं कि कैसे काव्या को उठा कर फेंक दिया था..उसकी किस्मत थी कि ड्राइवर बीच में आ गया...कैसे सौम्या का इलाज उसे गहने बेचकर करवाना पड़ा...घर से बाहर निकाल देना...चीज़ें तहस-नहस करना रोज की बात है...और जो बच्चों से प्यार का का दावा कर रहे हैं...'एक बार रूद्र पढ़ाई में मन नहीं लगा रहा था..उसने उसे डांट  दिया..'नहीं पढोगे तो पापा के पास भेज दूंगी..वहीँ रह के पढना' वो लड़का..इतना सुनते ही बेहोश हो गया...तो ये कैसा प्यार है उनका कि बच्चे उनके पास रहने की बात से ही बेहोश हो जाते हैं...इतना आतंक छाया हुआ है उनका बच्चों के मन पर....उनके साथ रहकर एक सामान्य जीवन कभी नहीं जी पायेंगे वो...माँ चुप रहीं...क्या कहतीं...बस इतना बोलीं..."बहुत थक गई हैं...नींद आ रही है, उन्हें " 

दूसरे दिन भी राजीव का नाटक जारी रहा. भैया माँ के सामने..सौम्या को गोद भी उठा लिया...बिना..'गन्दी मम्मी' का पाठ दुहरवाए रूद्र और काव्या को टॉफी भी दे दी. रूद्र तो आश्चर्य से कभी हथेली पर पड़ी चॉकलेट कभी उनका चेहरा देखता रह गया. जब भैया और माँ चुप रहे...और उसने सामान सहेजना नहीं छोड़ा...तो राजीव ने दूसरी चाल चली.."ठीक है..जाइए...बहुत दिन से नैहर नहीं गयी  हैं..मन उबिया गया है आपका...जाइए कुछ दिन घूम फिर के माथा ठंढा हो जाएगा..तो चली आइयेगा....जाइए कौनो बात नहीं..रह लेंगे हम कुछ दिन अकेले...बच्चा सबका त बहुत याद आएगा...हियाँ अईबे नहीं करेंगे...पोस्टिंग पर ही पड़े रहेंगे..."

"हम एक ही बात कितनी बार दुहरायें...हम हमेशा के लिए जा रहे हैं..."...कुछ  जोर से बोली वो...तो भैया बीच में आ गए..."ठीक है ना...कह तो रहे हैं...जाओ...चलो..चलो..अब क्यूँ गुस्सा हो रही हो..शान्ति से चलो,अभी....बाद की बाद में  देखी जायेगी..."..उन्हें भी शायद राजीव की बात से बल मिल गया था कि शायद  कुछ दिन रहकर वो वापस लौट आएगी.

"हाँ हम भी तो इहे चाहते हैं...इनके मन को शान्ति मिल जाए...पईसा ले लीजियेगा...अ जरूरत होगा...त खबर करियेगा..और भेज देंगे..बस आप खुश रहिए "

राजीव का यह दोहरा रूप देखकर मन वितृष्णा से भर उठा...वो हाथ का काम अधूरा छोड़ दूसरे कमरे में चली गयी....पर मन  ही मन दुहराया इस प्रण को कि वो अब इस नरक में नहीं लौटने वाली.

***
जाते समय भी राजीव स्टेशन तक छोड़ने आए...बच्चों को टॉफी-बिस्किट खरीद कर दिया...माँ,भैया और .जीवन में पहली बार उसके लिए भी चाय लेकर आए...माँ का मन पिघला जा रहा था...बस आंचल से आँसू पोंछने की ही कमी थी. यहाँ ये तीनो ऐसा व्यवहार कर रहे थे कि उसकी किसी नासमझी भरी जिद को वे लोग बड़ी समझदारी से पूरा कर रहे हैं.

माँ के घर पहुंचते ही..आँचल कमर में खोंस कर झाड़ू उठा काम में लग गयी. बच्चे भी शोर मचाते खिलखिलाते हुए आँगन में छत पर दौड़ लगाने लगे...बच्चों की इतनी निश्चितता भरी हंसी उसने पहले नहीं देखी थी...अपने घर में शोर मचाते शैतानियाँ करते भी एक सहम सी व्याप्त रहती थी...कब पिता आएँ और उनपर बरस पड़ें. 

भैया तो दूसरे दिन सुबह-सुबह ही वापस लौट गए. जब उसने माँ से कहा कि बच्चों का थोड़ी देर ध्यान रखे ..वो स्कूल में बात करने जा रही है तो माँ चौंक पड़ी..."अरे का सचमुच सोच ली हो..नहीं लौटोगी वापस ?"
"और क्या माँ...मैने तो सब बता  ही दिया था.."
"इतना जल्दी क्या है.....कुछ दिन रुक जाओ...फिर जाना स्कूल.." माँ को अभी भी उम्मीद थी..वो अपना फैसला बदल लेगी.
"ना माँ...बच्चों का जितना कम नुकसान हो पढ़ाई का...उतना अच्छा..आज से ही स्कूल में बात करना शुरू कर देती हूँ.."
माँ को कुछ और कहने का मौका दिए बिना...वो बाहर निकल गई .

बच्चों के नंबर अच्छे थे...ड्राइंग..खेल-कूद में कई सर्टिफिकेट भी मिले थे...उसके मनपसंद स्कूल में एडमिशन मिलने में दिक्कत नहीं हुई....पर उनलोगों ने टेस्ट लेने के लिए बुलाया...उसे पता था ये महज औपचारिकता है. ख़ुशी ख़ुशी घर लौटी...बच्चे नए स्कूल के नाम पर बड़े  उत्साहित थे. पर माँ निराश हो गयीं. कुछ बोली नहीं..दूसरे कमरे में चली गयीं. वो बच्चों को पढ़ाने बैठ गई....उन्हें जरूरी पाठ का रिविज़न करवाने लगी. जब खाना के लिए माँ को बुलाया...तो माँ ने कह दिया...'उनकी तबियत ठीक नहीं..वो खाना नहीं खायेंगी.."

हताश हो गई वो...उसे कभी भी चैन नहीं मिलेवाला...अब माँ की खुशामद करो...किसी तरह माँ को मना कर एक रोटी खिलाई...पर माँ का मुहँ फूला ही रहा.

 दूसरे दिन माँ ने फिर से एक बार समझाने  की कोशिश की...जब उसने सख्ती से मना कर दिया तो माँ का पल्ला आँखों से जा लगा...एक क्षण को बेबस हो गई पर फिर दिल को कठोर किया और 
सौम्या को उनकी गोद में डाल बोला...'देख..नानी को जरा भी परेशान किया है...तो आकर बहुत पिटाई करुँगी....बिलकुल तंग नहीं करना उन्हें...समझी.."

माँ ने सौम्या को  गोद में समेटते हुए कहा, "बहुत आई हैं इसकी पिटाई करने वाली....इसकी  नानी जिन्दा है अभी..."..सुकून आ गया दिल को...मन हुआ आगे बढ़ कर माँ के गले से लग जाए....पर रूद्र और काव्या... माँ- और नानी की ये नोंक-झोंक बड़े ध्यान से देख रहे थे और खी खी कर के हंस  रहे थे...डपटा उन्हें..."चलो चुपचाप और सब ध्यान से लिखना वहाँ..."

खुद पर ही आश्चर्य हो रहा था...इतना सब कुछ इतनी सहजता से वो कैसे कर पा रही है?...उसे अपनी अंदर छुपी शक्ति का ही अंदाज़ा नहीं था..घर का काम भी कर रही है...बच्चों को भी संभाल रही है..बाहर के भी काम निबटा रही है...अब विश्वास हो गया था..इतना मुश्किल नहीं होगा ये सफ़र....जीवन के झंझावात के बीच वो खे ले जायेगी अपनी कश्ती आराम से.

बच्चों के टेस्ट के परिणाम संतोषजनक थे...पर एडमिशन फीस...बच्चों के  स्कूल यूनीफॉर्म .उनके टेक्स्ट-बुक सबका खर्चा जोड़ा...तो उसके होश उड़ गए...इतने पैसे तो उसके पास थे नहीं. घर पर जब माँ ने उसे सोच में निमग्न देखा तो कहीं उनके चेहरे पर एक संतोष की लहर कौंध गई...उन्हें लगा...बच्चे टेस्ट में सफल नहीं हुए और अब उन्हें वहाँ एडमिशन नहीं मिलेगा.

पर जब उसने सच्चाई बतायी तो बोलीं.."ये तो पता ही था...आखिर पैसे तो चाहिए ही...और पैसे तो हर महीने  ही चाहिए होंगे...फिर घर का खर्चा है...सौम्या बड़ी होगी..उसका भी खर्चा  होगा...चलो पिताजी के पेंशन से कुछ तो सहायता होगा..पर पूरा खर्चा तो नहीं निकलेगा..इसीलिए कह रहे थे ना...सब अच्छी तरह सोच लो..तीन तीन बच्चों की  जिंदगी का सवाल है...इसीलिए एक औरत का घर से पैर निकालना मुश्किल होता है...अभी भी कुछ बिगड़ा थोड़े ही  है..मेहमान तो कहे  ही हैं...कुछ दिन मन बदल के चले आना...चलो तुमको भी पता चल गया...इतना आसान नहीं है...अकेले के दम पर जीना..चलो तुम आराम करो....कितने दिन से हैरान हो रही हो...हम खाना बनाते हैं..."

वो गंभीर सोच में डूबी रही...खाने के समय माँ ने फिर जिक्र छेड़ा तो उसने कह दिया..."माँ,  मैं वापस जाने वाली नहीं हूँ... सोच रही हूँ पैसे का इंतजाम कैसे करूँ?? "

"भैया.. दीदी लोग से कहोगी...?" माँ ने धीरे से पूछा...
वो कुछ देर सोचती रही...फिर बोली..'नहीं माँ...उसी से कहूँगी.....जिसकी जिम्मवारी हैं ये लोग...इनकी पढ़ाई का पैसा तो उनको  देना ही पड़ेगा..."

और उसने देर नहीं की, उसी समय एक चिट्ठी लिखी...और सुबह ही पोस्ट कर दिया....स्कूल से एक हफ्ते का समय ले लिया था और इंतज़ार करने लगी. उनका एक  लाइन का जबाब  आया..." "अगर  वापस नहीं लौटेंगी तो एक पैसा नहीं दूंगा "

उसने माँ से कुछ भी नहीं कहा..और अपने कंगन बेचकर बच्चों की फीस...उनकी किताबों और यूनिफॉर्म का इंतजाम किया. खुद के लिए भी नौकरी ढूँढने लगी और घर के पास के ही  स्कूल में शिक्षिका की नौकरी मिल गई. पर पता था...सिर्फ उसके वेतन से ये सारे खर्चे  पूरे नहीं हो पायेंगे...और राजीव को भी वो यूँ उनकी जिम्मेवारियों से मुक्त नहीं करना चाहती थी. उसने पुराने कागज़ात निकाले...जिसमे वो पुराना शिकायती पत्र था...जिसमे उसने ससुराल वालों के अत्याचार की बात लिखी थी...इनलोगों का आश्वासन पत्र भी कि अब वे ऐसा नहीं करेंगे. सबकी प्रतिलिपि उसने इतने दिनों सहेज कर रखी थी. राजीव ने शुरू में पूछा भी था ..तो उसने कह दिया था कि वो सब तो उसने कब का फाड़ कर फेंक दिए. 

इन पत्रों के साथ एक नई चिट्ठी लिखी...जिमसे राजीव के इतने दिनों के जुल्म की  दास्तान लिखी..ये भी लिखा कि उनकी धमकी की वजह से पुलिस की नियमित पूछताछ के बावजूद वो कहती रही कि 'सब ठीक है..' पर अब वो उनके साथ नहीं रहना चाहती..लेकिन  राजीव बच्चों की पढ़ाई का भी खर्च नहीं दे रहे...उनपर बच्चों की शिक्षा के पैसे देने का दबाव डाला जाए नहीं तो फिर उसे पुलिस में शिकायत करनी पड़ेगी. 

और ये सब एक बड़े से लिफ़ाफ़े में डालकर उसने  उस जिले के कमिश्नर को भेज दिया,जहाँ राजीव पोस्टेड थे. 
राजीव को कमिश्नर के ऑफिस में बुला कर  जबाबतलब  किया गया . 
बदले में राजीव ने चपरासी के हाथों एक चिट्ठी भेजी कि वे 'तलाक' चाहते हैं...और अब फैसला कोर्ट में ही होगा.

(क्रमशः)