कहानी अब तक
(जया के कविता संग्रह को पुरस्कार मिलने पर पत्रकारों ने उसकी दर्द भरी कविताओं का राज़ पूछा . जया पुरानी यादों में खो गयी..उसका बचपन बड़े प्यार में बीता था ....राजीव से शादी होने के बाद...ससुराल में पति और सास ने हर तरह के अत्याचार किए.बेटे के जन्म के बाद बेटे को उस से छीन लिया गया. उसने पुलिस में शिकायत की तो ससुराल वालों के खिलाफ केस दर्ज हो गया. माफ़ी मांग कर उसे वापस घर ले आए. थोड़े ही दिनों बाद राजीव के जुल्म फिर शुरू हो गए. .उसने दो बेटियों को जन्म दिया ..पर गहरे अवसाद का शिकार हो गयी...बच्चों के साथ,आत्महत्या का प्लान करने लगी..पर अपनी बेटी के नोटबुक में लिखा देख कि 'वो मरना नहीं चाहती बड़ी होकर दुनिया को अपनी माँ की हिम्मत के विषय में बताना चाहती है'...उसमे एक नई शक्ति का संचार हो गया और जया ने अपने माँ-भाई को खबर कर दी कि उसने राजीव को छोड़कर अलग रहने का फैसला ले लिया है. वह अपनी माँ के घर आ गयी. बच्चों के एडमिशन करवाने के लिए राजीव से पैसे मांगे तो जबाब में राजीव ने तलाक का नोटिस भेज दिया. उसने अपने कंगन बेचकर बच्चों का एडमिशन करवा दिया पहले एक स्कूल में फिर बैंक में नौकरी कर ली...पर राजीव बैंक में उसे बहाने से तंग करते रहे ..वाहन के अधिकारियों ने भी उसका शोषण करना चाहा...उसके शिकायत करने पर उसे नौकरी से अलग कर दिया.)
गतांक से आगे
एक बार बच्चों को लेकर कोर्ट गयी थी. फिर खुद अकेले वकील के साथ ही जाती रही ...पर अक्सर राजीव ही उपस्थित नहीं होते और डेट आगे बढ़ जाती.
एक दिन महिला सेल की डी.एस.पी. मिलने आयीं. पहले भी महिला सेल के अधिकारी उसका हाल-चाल लेने आते रहते थे...और वो उन्हें झूठी तसल्ली देती रहती थी कि 'सब ठीक है'....उन्होंने प्रस्ताव रखा कि एक बार उनके ऑफिस में आकर मिल ले..'राजीव बात करना चाहते हैं...'
पहले तो उसने मना कर दिया लेकिन फिर सोचा..'चलो अच्छा है ..डी.एस.पी. की उपस्थिति में ही पूछ लेगी कि जब उन्होंने डिवोर्स फ़ाइल कर दिया है...उस से अलग होना चाहते हैं...फिर उसे अपनी शर्तों पर जीने क्यूँ नहीं दे रहे?....क्यूँ उसकी नौकरी ट्यूशन छुडवाने की कोशिश क्यूँ करते रहते हैं...? "
पर ये सब पूछने का मौका ही नहीं आया. घर पर तो वे डी.एस.पी बड़ी मृदुता से बात कर रही थीं. पर वहाँ उनके तेवर ही बदले हुए थे. राजीव पहले से ही उनके ऑफिस में बैठे हुए थे और वे उस से ही उल्टा सवाल कर रही थीं कि "वे बच्चों को लेकर क्यूँ चली आई हैं...ये बच्चे से मिलने को तरस रहे हैं....मिलने क्यूँ नहीं देतीं.?? "
वो तो जैसे आसमान से गिरी....कोर्ट में दो घंटे बच्चे, राजीव की नज़रों के सामने थे और राजीव ने एक बार उनके सर पर हाथ नहीं फेरा...उनसे एक बात नहीं की और अब उसपर उल्टा आरोप लगा रहे हैं कि "वो मिलने नहीं देती"
"बच्चे इनके भी हैं...ये जब चाहें मिल सकते हैं...मैं कैसे मना कर सकती हूँ.."..उसने अपनी बात कही.
"अरे ई इतना जहर भर दी हैं, बच्चा सब के मन में कि मिलना ही नहीं चाहता है,ऊ लोग .....हमसे दूर कर दी हैं..ऊ सबको." राजीव गरजे.
"बच्चों ने आपके जुल्म सब अपनी आँखों से देखे हैं...इसीलिए दूर हो गए हैं....मैने कुछ उन्हें नहीं सिखाया-पढाया " उसकी आवाज़ भी तेज हो गयी.
"अब वो सब तो पति-पत्नी के बीच ...थोड़ा-बहुत चलता ही रहता है...इसका मतलब ये तो नहीं कि बाप को बच्चों से अलग कर दिया जाए.." डी.एस.पी. पता नहीं कौन सी बोली बोल रही थीं.
"लगता है..आपको हमारे केस के बारे में कुछ मालूम नहीं..प्लीज़ आप पहले सारी फ़ाइल पढ़िए और जानने की कोशिश कीजिए...कि क्या कुछ हो चुका है.."
"हम एक नज़र में ही सब जान लेते हैं...पुलिस वाले की नज़र है...आप सताई हुईं तो बिलकुल नहीं लगतीं..."
राजीव ने भी एक भरपूर नज़र डाली उस पर और वो थोड़ी सी असहज हो गयी. ये तो सच था....एक साल में उसकी काया पलट हो गयी थी. अब घर से बाहर निकलना पड़ता...खुद को प्रेजेंटेबल रखती. अपने रखरखाव...अपने कपड़े का ख्याल रखती. कॉटन की तीन-चार साड़ियाँ ही थीं उसके पास. पर स्टार्च लगी हुई...मैचिंग ब्लाउज के साथ ही पहनती वह.
एक हाथ में कड़ा.. ...और दूसरे में घड़ी. माथे पर छोटी सी काली बिंदी और ढीली सी एक चोटी. बस इतना सा श्रृंगार था उसका. पर उसका यह सादा रूप भी लोगों की आँखों में चुभता. शायद उसकी वजह थी उसकी चपलता और होठों पर सजी मुस्कराहट. पर अपना दुख छुपाये रखने के लिए इस मुस्कराहट का आवरण भी जरूरी था.
अब अपने खाने-पीने का भी ख्याल रखने लगी थी. सोचती ,उस पर ही पूरे घर -बच्चों की जिम्मेदारी है, वो बीमार पड़ना अफोर्ड नहीं कर सकती. पहले जहाँ दो दो दिन डिप्रेशन के मारे अन्न का दाना नहीं डालती थी मुहँ में. अपने ऊपर किए गए जुल्मों के विरोध का और कोई तरीका था भी नहीं, उसके पास ...और वो खाने पर ही अपना सारा क्रोध निकालती. शायद राजीव के घर में दिन के दो बजे के पहले कभी खाना खाया भी नहीं. घर का सारा सारे काम निबटाते इतना वक़्त हो ही जाता . उनके यहाँ ,नाश्ता तो शायद कभी किया ही नहीं.
पर अब सुबह चाय भी दो बिस्किट के साथ लेती कि कहीं एसिडिटी ना हो जाए..समय पर नाश्ता-खाना. रात में भी नौ बजे के पहले खाना निबटा देती. अब घर में पहले किसी पुरुष को खाना खिलाने का इंतज़ार नहीं करना था. इस अनुशासित दिनचर्या का असर उसके शरीर पर भी पड़ा था. मुरझाया चेहरा खिल आया था. दबा हुआ रंग निखर गया था. उभरी हड्डियां अब छुप गयी थीं.
और खुद में आए ये सारे परिवर्तन उसने राजीव की नज़रों के प्रतिबिम्ब में भी देखे.
पर उसने सीधी बात करने की सोची.." ठीक है....कोर्ट में केस चल ही रहा है...यहाँ बहस से क्या फायदा...आप कह रही थीं..बात करनी है...बताइए क्या बात करनी है?.."
"ई चाहते हैं..आप वापस लौट आइये...इनकी बहुत बदनामी हो रही है.." डी.एस.पी बोलीं.
"ये अब संभव नहीं...आगे बोलिए " उसने दो टूक बात की.
"क्यूँ संभव नहीं....इनको आपसे शिकायत है...आपको इनसे...बैठ कर सुलह कर लीजिये..और अपना घर दुआर संभालिये अब "
"मुझे कुछ काम है...अब जाना होगा..." कहती वो उठ गयी.
"अरे रुकिए तो...बात तो कीजिए..." डी.एस.पी. कहती रह गयीं...वो उठ कर चली आई.
थोड़ी दूर आने के बाद पाया....वो अपने साथ लाया थैला तो वहीँ बगल की कुर्सी पर छोड़ आई है.
मुड कर वापस लौटी ..ऑफिस के दरवाजे पर ही थी कि सुना, डी .एस.पी. साहिबा कह रही थीं.." अब हम तो अपनी तरफ से कोशिश किए पर वो बड़ी जिद्दी हैं.."
जैसे ही अंदर कदम रखे, देखा ...राजीव एक नोटों का बंडल..डी.एस.पी. को पकड़ा रहे थे.
उसे देखते ही जल्दी से हाथ नीचे कर लिए पर वो देख चुकी थी और समझ चुकी थी कि इसीलिए डी.एस.पी. इन पैसों की भाषा बोल रही थीं.
***
नियमित धनोपार्जन कुछ था नहीं...नौकरी मिलती और छूटती रही...पर अच्छी बात ये रही कि छूटने के बाद भी नए अवसर मिलते रहे. नए ट्यूशन ले लिए....सुबह सुबह अखबारों में नौकरी के विज्ञापन वाले कॉलम देख कर पेन से गोल घेरा बना देती और फिर शुरू होता सिलसिला फोन करने का.
अब घर में फोन लग गया था...ये सुविधा तो हो गयी थी पर उसके जीवन में एक अच्छी बात भी अपने साथ ढेरों तकलीफें लेकर आती . राजीव ने भी कहीं से घर के नंबर हासिल कर लिए और फोन पर गालियों का सिलसिला शुरू कर दिया. बच्चों को भी नहीं बख्शते . उन्हें धमकाते..'तुमलोगों को तो मेरे पास ही रहना होगा..." ..देखना कोर्ट तुम्हारी कस्टडी मुझे ही देगा..तुम्हारी माँ कमाती है, क्या ?.कहाँ से खिलाएगी??..कहाँ से पढ़ायेगी ?."
बच्चे बुरी तरह से डर जाते. अक्सर उन्हें तेज बुखार आ जाता. रात को नींद से हडबडा कर उठ जाते. कोई बुरा सपना देखा होता उन्होंने. वो बहला देती...'ऐसा कुछ हुआ तो हम सबलोग दूर किसी शहर में भाग जायेंगे...किसी को पता नहीं लगने देंगे कहा जा रहे हैं.." वे छोटे थे..उसकी बातों पर विश्वास कर के आश्वस्त हो जाते. पर वो चिंता में पड़ जाती कहीं सच में कोर्ट ने कस्टडी उन्हें सौंप दी तो क्या करेगी वो??
फोन की घंटी बजती तो उसका दिल धड़क जता..'कहीं राजीव ना हों' कभी कभी देर रात घंटी घनघनाती...वो चौंक कर फोन उठाती, शायद भैया -दीदी लोगो का हो..कोई जरूरी बात हो...पर उधर से आतीं राजीव की नशे में डूबी आवाज़ में धमकियां...'तुम्हे देख लूँगा' के साथ गालियों की जो बौछार शुरू होती कि उसे फोन रिसीवर पर से हटा कर रखना पड़ता .कई बार सुबह फोन वापस क्रेडल पर रखती और फोन घनघना उठता ...यानि कि नशे में धुत्त राजीव पूरी रात ट्राई करते रहते.
एक दिन एक फोन आया, कि "मैडम जी, मुझे ईश्वर का संदेश मिला है कि आप बहुत परेशानी में हैं ...अगर शनिवार को आप हमारे पास अकेले आएँ तो आपके सारे कष्ट दूर कर सकता हूँ "
वो समझ गयी ये भी राजीव की एक चाल है...टालने के लिए बोली, "ठीक है...आ जाउंगी.."
"बहुत बढ़िया ..अभी आपको पता बता देते हैं और जरा अपना 'डेट ऑफ बर्थ' बता दीजिये तो..."
"जो बगल में खड़ा होकर फोन करवा रहा है,ना...उसी से मांग लीजिये .." कहकर उसने फोन रख दिया.
पर राजीव हार मनाने वाले नहीं थे...एक दिन माँ ने बताया कि उन्होंने फोन उठाया था और राजीव ने कहा कि वे बच्चों से मिलना चाहते हैं...इतवार को उनसे मिलने आ रहे हैं.."
वो मना तो कर नहीं सकती थी,चुप रही.
इतवार को राजीव तीन-चार अजीब से लोगों के साथ आए. आते ही कहने लगे ," इनलोगों का कहना है कि हमारी जिंदगी पर बुरा साया है...आप पर किसी ने जादू-टोना कर दिया है...ये लोग सब ठीक कर देंगे "
"पर आपने तो कहा था...आपको बच्चों से मिलना है.."
"हाँ उनसे भी मिल लेंगे...पहिले ई लोग का ज़रा बात सुन लिया जाए..का हर्जा है...हमको भी बुझा रहा है....कोई कुछ टोना कर दिया है...एकदम से आप कईसे बदल गयीं...आप तो केतना सीधी-सादी थीं..तनका इलोग का बात सुन लीजिये.."
राजीव के लगातार अत्याचार ने उसके अंदर की शक्ति को ललकार कर जगा दिया है...ये बात वे समझ नहीं पा रहे थे या शायद उनका अहम् स्वीकार नहीं कर पा रहा था. इसलिए नित नई चाल चल कर उसे तोड़ने की कोशिश में संलग्न थे.
उसने बच्चों को अंदर भेज दिया और दरवाजे के पास खड़ी हो गयी. समझ नहीं पा रही थी..इन्हें कैसे घर से निकाले...राजीव कुछ तमाशा ना कर दें...बेकार महल्ले में बात फैलेगी.
एक लाल आँखों वाला आदमी सीधा उसकी तरफ देखते हुए बोला.."इसके सर पर एक साया मंडरा रहा है...मुझे यहीं से दिख रहा है... तनी इधर आओ..."
वो अपनी जगह से हिली नहीं...तो वो राजीव से बोला..." ई साया इनको बस में कर लिया है...वही ई सब करवा रहा है.,..इनका कौनो दोस नहीं है..."
"आइये आइये इधर आइये तनिका.....ई सब ठीक कर देंगे .." राजीव ने कहा.
उसका दिमाग तेजी से दौड़ रहा था...कैसे निबटे इन सबसे. तब तक उस आदमी ने खुद ही उपाय थमा दिया .बोला, "ठीक है...वहीँ खड़े रहिए...ई बताइए आपको मन में कैसा बुझाता है...कैसा फील होता है.."
उसने भी अपनी आँखें चौड़ी कर लीं...और थोड़े भारी स्वर में बोली.." हाँ कुछ अजीब अजीब सा लगता है...सामने वाले को देख के हमको पता चल जाता है...कि वो मेरे बारे में क्या सोच रहा है...और कुछ भी गलत-सलत लगता है...तो मन करता है...उसको खूब मारें....कभी कभी तो जो भी हाथ में आता है...वही चला देते हैं.."
वो आदमी राजीव से बोला.."देखिए हम कह रहे थे ना...इनके ऊपर साया है..बड़ा पूजा करवाना होगा...मुर्गा कटवाना होगा...चलिए हम लड़की को देख लिए...सब समझ गए...अब हम तंत्र मन्त्र से सब ठीक कर देंगे...अब चलिए इहाँ से ई साया इस से कुछ भी करवा लेगा.."
वो मन ही मन हंस पड़ी..'डर गया है...वो तांत्रिक..'
"अरे रुकिए..."..राजीव कहते रह गए पर वो आदमी अपने चेलों के साथ उठ गया. राजीव को भी जाना पड़ा...बच्चों से मिलने का तो बहाना था..पर इसे भी अच्छा हथियार बनाया राजीव ने..अक्सर उनसे मिलने के बहाने , किसी ना किसी ओझा-गुणी को लेकर आते और हर बार उसे नए पैंतरे अपना कर उन्हें भगाना पड़ता.
ये उपाय कारगर ना होता देख,उन्होंने एक नया तरीका अपनाया. एक रात जीप उसके दरवाजे पर रुकी. राजीव ने दरवाज़ा खटखटाया. वो खिड़की से राजीव की जीप देख चुकी थी. असमंजस में पड़ गयी अगर दरवाज़ा नहीं खोलती है तो पता नहीं क्या हंगामा करें. महल्ले वाले भी डिस्टर्ब होंगे. माँ भी जाग रही थीं...उनसे ही दरवाज़ा खोलने को कहा. और बोली ..".. बाहर बरामदे पर ही रोक देना और कह देना..बच्चे सो गए हैं..."
पर खिड़की से उसने देखा..उनका चपरासी दो सूटकेस उठाये राजीव के पीछे -पीछे आया और बाहर बरामदे में सूटकेस रख दिया. ये माजरा कुछ समझ नहीं आया और वो बाहर निकल आई . राजीव अपने चपरासी से कह रहे थे, "अरे, ये यहाँ क्यूँ ले आए...??"
मुहँलगा चपरासी बोला.."सर आपका घर है ये.....आपके बीवी बाल-बच्चे यहाँ हैं तो आप कहाँ जायेंगे?...आप क्यूँ गेस्ट हाउस में ठहरियेगा.?..यहाँ अपने बच्चों के साथ रहिए "
"ठीssक है..अब तुम ऐसा कहते हो तो यही सही..रख दो अंदर सूटकेस..." सारे जाल राजीव के रचे हुए थे..पर वे अनभिज्ञता दर्शा रहे थे.
वो गुस्से से भर उठी..एकदम सख्त आवाज़ में बोली.."खबरदार जो अंदर कदम रखा है...ले जाओ सूटकेस..और अब आप भी मेरे घर में नहीं आ सकते...कोर्ट में फैसला होने दीजिये...जब तक कोर्ट से निर्देश नहीं मिलते...अब आप बच्चों से भी नहीं मिल सकते...बच्चों से तो आपको कभी मिलना ही नहीं था...हर बार उनका बहाना बना कर नई चाल, चलते रहे.....अब आप इस घर में कदम नहीं रखेंगे.." अंदर से डर भी रही थी...कहीं राजीव भी चिल्लाने ना लगें...पर ड्राइवर और चपरासी की उपस्थिति में वे अपनी फजीहत नहीं करवाना चाहते थे. उसका रौद्र रूप देख वो भी समझ गए थे..'वो चुप नहीं रहेगी'
"हाँ ठीक है...अब कोर्ट में ही फैसला होगा..एक पैसा नहीं देंगे...रोड पर भीख ना मंगवाए तब कहियेगा.." फुफकारते हुए वे वापस चले गए.
बाद में एक रात चपरासी ने उसे फोन करके कहा.." आप मेरे साहब के साथ जो कर रही हैं...ये अच्छा नहीं कर रहीं...भगवान इसका फल जरूर देगा आपको.."
उसकी सहनशक्ति जबाब देने लगी थी. उसने राजीव की पोस्टिंग वाले शहर के डी.एम. को एक पत्र लिखा...और उसमें राजीव और उनके चपरासी की सारी करतूत बयाँ कर दी कि 'वे लोग अक्सर फोन करके उसे धमकाते हैं...उसका जीना मुश्किल कर दिया है."
राजीव को बुला कर पूछताछ की गयी , राजीव ने एक बार तो फोन करके अपनी सारी भड़ास निकाली पर उसके बाद उनके फोन आने बंद हो गए.
***
उसे एक बड़ी कंपनी में रिसेप्शनिस्ट का काम मिल गया था. माँ ने थोड़ी आपत्ति जताई पर उसने कहा...'एक तो उसके पास क्वालिफिकेशन नहीं है..अनुभव नहीं है...और पैसों की भी जरूरत है..वो ज्यादा चूजी नहीं हो सकती.
जिंदगी फिर से ढर्रे पर आने लगी थी...इसी दौरान कोर्ट से बुलावा आया.बच्चों को भी लेकर जाना था.
लेडी जज थीं...उन्होंने रूद्र और काव्या से अलग कमरे में काफी देर तक बात की. उसका मन काँप रहा था..ऐसा ना हो वे बच्चों की कस्टडी राजीव को दे दें. (पर जज ने बच्चों से तरह तरह के सवाल कर के उनके प्रति राजीव के व्यवहार का पता कर लिया और फैसला उसके हक़ में सुनाया. राजीव से ये भी कहा कि अगर बच्चों का सम्मान पाना है तो उनका मन जीतना होगा, उन्हें प्यार देना होगा...तलाक की सुनवाई अभी चलती रहेगी..फैसले पर इतनी जल्दी नहीं पहुंचा जा सकता पर तब तक एक निश्चित रकम बच्चों को और जया को मिलती रहेगी. इस ऑर्डर को पढ़कर वकील ने कहा.."अब आगे जो भी फैसला हो पर ..राजीव किसी बच्चे को लेने की बात नहीं कर सकते."..एक बड़ा बोझ उसके दिल से उतर गया.
बाद में काव्या ने बताया कि जज ने पूछा था कि क्या कभी पापा ने प्यार नहीं किया..कभी टॉफी -चॉकलेट नहीं दिया...?" स्पष्टवादी काव्या ने कह दिया कि "कहते थे बोलो मम्मी गन्दी है..तभी चॉकलेट दूंगा "
जज ने बच्चों की परवरिश के लिए एक हर महीने एक अच्छी रकम देने का निर्देश दिया था. उसे शान्ति मिली कि आखिर अब उसका संघर्ष सफल हुआ..वो चिंतामुक्त हो जी सकेगी. परन्तु अभी इस व्यवस्था की खामियों से दो चार होना बाकी था. उसके वकील ने निर्देश दिया कि इस रकम में उनलोगों का भी हिस्सा है..कुछ अंश वे ले लेते. कुछ जूनियर वकील ..को दिलवा देते. सबका हिस्सा देते उसके हाथ में आधी रकम भी नहीं पहुंचती.
आखिर कुछ महीने बाद खुद उसने राजीव से कहा कि वे सीधा उसके पास ही वो रकम भेज दिया करें. राजीव ने शर्त रखी कि वे महीने में एक बार हेड ऑफिस में मीटिंग के लिए आते हैं तो वो बच्चों के साथ आकर पैसे खुद ले लें . राजीव से मुखातिब होने की बात सोच कर ही उसकी रूह काँप जाती. पर बच्चों के लिए ये करना ही था. बच्चे भी सहमे से रहते.
गेस्ट हाउस में राजीव बिस्तर पर मसनद लगाए किसी महंथ की तरह लेटे रहते. वो बच्चों को लेकर सामने कुर्सी पर अपराधी की तरह सर झुकाए बैठी रहती. कचर कचर पान चबाते राजीव का एकालाप चलता रहता. "कुछ नहीं बनोगे तुमलोग..ई तुमलोग की माँ तुमलोग का जिन्नगी खराब कर दी है...बिन बाप के रहने वाले बच्चे का कहीं कोई पूछ है.?..तनिका लोग को पता चलने दो...कोई बात नहीं करेगा तुमलोग से...अकेले पड़ जाओगे एकदम...कुछ नहीं कर पाओगे जिंदगी में..एक चपरासी का नौकरी भी नहीं मिलेगा..."
वो पहले से जानती थी 'राजीव' को हमेशा एकतरफा संवाद ही पसंद है. वे घंटो अकेले बोल सकते हैं. उन्हें किसी से बातचीत करते कभी नहीं सुना..ऐसा कभी नहीं होता था कि वे 'दो अपनी कहें' और 'दो किसी की सुनें'. पहले भी वे एकतरफा अपनी ढपली बजाते रहते और उनके जूनियर ऑफिसर उसपर 'हाँ.. हाँ' की थाप लगाते रहते. या फिर उनके सीनियर अफसर हों तो बस सुनायी देता..'जी सर..'... 'जी.. जी सर.." हाँ सर'.. "एकदम ठीक सर"
यहाँ तो उन्हें पूरा मौका मिल रहा था...ना तो वे लोग उठ कर जा सकते थे ना ही कोई जबाब दे सकते थे. वो कुछ कहती तो फिर झगड़ा बढ़ता और शायद वो पैसे देने से मना कर देते फिर लगाते रहो कोर्ट के चक्कर. बाद में बच्चों का डरा चेहरा देख कर समझाती 'किसी के कहने से कुछ नहीं होता...बल्कि तुमलोग इसे चैलेंज की तरह लो और भी अच्छे से पढ़ लिख कर बड़े आदमी बन कर दिखाओ "
राजीव अक्सर रूद्र को नुक्कड़ से पान लाने के लिए कहते. पीछे वो और काव्या रह जाती...राजीव का प्रलाप चलता रहता. एक बार काव्या की तबियत ठीक नहीं थी...वो साथ नहीं गयी. सिर्फ रूद्र साथ था. कुछ ही देर बाद राजीव ने रूद्र से पान लाने के लिए कहा...अब कमरे में सिर्फ वो और राजीव रह गए थे. उसका दिल किसी अनागत की आशंका से धड़क उठा. और आशंका गलत नहीं थी.. रूद्र के जाते ही राजीव उठे और दरवाज़ा बंद करने लगे...'अभी डिवोर्स हुआ नहीं है....अभी भी आप हमारी पत्नी हैं...पत्नी धरम निबाहिए "
किसी तरह वो राजीव को धक्का देते हुए बाहर भाग आई. बुरी तरह हांफ रही थी. रूद्र को आते देखा तो खुद को व्यवस्थित किया...रूद्र ने पूछा.."यहाँ क्यूँ खड़ी हो माँ.."
"तुम्हारी राह देख रही थी..कि इतना देर क्यूँ लग रही है.."
रूद्र कुछ बोला नहीं...उसने जाकर पान राजीव को दे दिए.
इसके काफी दिनों बाद, एक बार फिर काव्या नहीं जा सकी और रूद्र के साथ उसे ही जाना पड़ा. रूद्र ने रास्ते में ही बोला.."माँ दस पान बनवा कर ले चलते हैं...वरना वे मुझे फिर पान लेने भेज देंगे..."
रूद्र पान बनवाने चला गया और वो अपने बेटे को एकटक देखती रही....इतने कम समय में ही कितना बड़ा हो गया उसका बेटा और कितना कुछ समझने लगा,इस कच्ची सी उम्र में ही.
(क्रमशः )


.jpg)