Saturday, September 2, 2017

लाहुल स्पीती यात्रा वृतांत -- 3 ( रेकॉंग पियो, काल्पा, नाको, टाबो )


रेकॉंग पियो 
सांगला के बाद हमारा अगला पड़ाव काल्पा था. चंडीगढ़ से ही हमें खूबसूरत रास्ते मिल रहे थे पर काल्पा तक का रास्ता तो वर्णनातीत था. काल्पा से पहले एक छोटा सा शहर है ,रेकौंग पियो (Reckong Peo ) . अगर 'लव एट फर्स्ट साईट' जैसा कुछ होता है तो वो पहली बार महसूस किया मैंने. इस शहर को देखते ही मैं इसके प्यार में पड़ गई. चारों  तरफ से झुके झुके से पहाड़ ,उनके नीचे फूलों से लदे पेड़ और इन सबसे घिरा ये खुबसूरत छोटा सा कस्बा. लिटरली पहाड़ों  की  गोद में बसा लग रहा था .पहली बार इच्छा हुई कि बस यहीं बस जाऊं. थोड़ी देर ही रुके वहां, चमचमाती सडकें थीं, बड़ी बड़ी दुकानें थीं....यानि अनुपम प्राकृतिक छटा के साथ सारी आधुनिक सुविधाएं भी मौजूद थीं. एकाध घंटे वहाँ बिता बाद बड़े बेमन से हम कार में सवार हुए .

काल्पा पहुँच कर होटल की  खिड़की से पर्दा हटाया और सामने नजर आती कैलाश  किन्नर की बर्फ ढंकी चोटियों  ने विस्मय विमुग्ध कर दिया. इतने पास से हिमालय की चोटियों को देखने  का पहला अवसर था.. काल्पा सतलज नदी के किनारे समुद्र तल से 9,711 फीट की उंचाई पर बसा हुआ  है. यहाँ सेब और चिलगोज़े के बड़े बड़े बाग़  हैं. ऊँची नीची पहाड़ियों पर घर और होटल बने हुए हैं. .यहाँ रहने वाले  हिन्दू और बौद्ध धर्म दोनों  के अनुयायी  हैं ,इसी वजह से बहुत भव्य मन्दिर  और  बौद्ध मठ हैं.  शिक्षा का स्तर काफी अच्छा है .करीब 83.75% लोग साक्षर हैं. काल्पा के साथ एक बहुत रोचक जानकारी जुडी हुई है. भारत के पहले वोटर ''शायम शरण नेगी'  काल्पा से ही थे .२५ अक्टूबर १९५१ के सर्वप्रथम चुनाव में सबसे पहले वोट उन्होंने ही डाला था .

काल्पा से टूरिस्ट 'चाक ट्रेकिंग' के लिए जाते हैं, सुंदर पेड़ पौधों और झरनों से घिरा ये छोटा सा ट्रेक है. ऊपर से बहुत ही नयनाभिराम दृश्य देखने को मिलते हैं.  हिमाचल के ग्रामवासियों का जीवन करीब से देखने के लिए 'रोघी गाँव 'भी जाया जा सकता है. वहीँ बीच में सुसाइड पॉइंट भी है .वहाँ से बहुत सुंदर सूर्योदय-सूर्यास्त दिखते हैं. शायद किसी ने आत्महत्या कर ली होगी या फिर वहाँ से गिर कर बचा नहीं  जा सकता, शायद इसीलिए इसका नाम सुसाइड पॉइंट है. काल्पा में  बहुत ही पुराना 'नारायण नागिनी मन्दिर' और' हू-बू-लान-कार  मॉनेस्ट्री' भी देखने योग्य हैं. ये मॉनेस्ट्री  (950-1055 AD) में स्थापित किया गया था पर बाद में इसका नवीनीकरण भी होता रहा है, क्यूंकि यह बहुत ही अच्छी अवस्था में था . मॉनेस्ट्री शहर के बिलकुल बीच में है या शायद इसके गिर्द ही शहर बस गए होंगें.खूब चटख रंगों में दीवारे पेंट की हुई थीं और रंगीन प्ताके,(प्रेयर फ्लैग्स ) बंधे थे .मॉनेस्ट्री देखते हुए हम हम कस्बे के मार्केट की तरफ निकल गए. पतले से रास्ते के किनारे किनारे बने लकड़ी के मकान .कुछ मकान बहुत ही जर्जर अवस्था में नजर आरहे थे.पता नहीं उसमें लोग कैसे रहते होंगे .एक घर के बाहर चार महिलायें अपने काम से फुर्सत पाकर बैठीं गपशप कर रही थीं .सबने हिमाचली टोपी पहनी हुई थी.मैं उनकी तस्वीरें लेने का लोभ संवरण नहीं कर पाई. 
कैलाश किन्नर 

मार्केट से निकल कर हम नीचे जाने वाले सडक पर निकल गए. खुले में आते ही  किन्नर कैलाश की खूबसूरत चोटी बिलकुल साफ़ नजर आने लगी , देखकर ऐसा लगता, जैसे बिल्कुल पास ही हो .इस स्थान को शिव जी का शीतकालीन प्रवास माना जाता है. . शायद जीवन की पहली सेल्फी मैंने किन्नर कैलाश के साथ ली :) . सामने सर्पीला रास्ता और बिलकुल सुनसान पर किसी तरह का डर नहीं. इक्का दुक्का लोग आते दिखते या फिर गाड़ी में सर्र से पार हो जाते. शाम ढल रही थी ,ढलान पर फैले चीड़ के वृक्षों के बीच से हवा सिटी बजाती हुई निकल जा रही थी. इतना सुहाना लग रहा था कि मेरा लौटने का मन ही नहीं हो रहा था और मैं नीचे उतरती चली गई .जबकि पता था ,वापसी में इतनी ही चढाई चढनी पड़ेगी पर उपाय सोच लिया था ,जब बिलकुल थक जाउंगी या अन्धेरा हो जाएगा तो ड्राइवर  को फोन कर बुला लूँगी . बेटे को मेरा साथ देना पड़ा.  कहते बुरा लग रहा है पर शायद अपने जाने पहचाने शहरों में हम यूँ अन्धेरा होते वक्त सुनसान सडक पर नहीं घूम पाते. हमारे पास महंगे मोबाइल फोन्स और महंगे  कैमरे भी थे पर पहाड़ों में ज़रा भी खतरा नहीं है . एक मित्र ने विस्तार से व्याख्या कि थी कि पहाड़ में कम जनसंख्या होती है. पुलिस करीब करीब सबको जानती है. फिर कोई वारदात, चोरी वगैरह करके वे भाग भी नहीं सकते , सुरक्षा की इन वजहों के साथ पहाड़ियों का ईमानदार होना भी एक बहुत बड़ा कारण है.अक्सर खाली सड़कों के बिलकुल बीच में बैठकर ,या डांस का पोज देते हुए लोगों की तस्वीरें देखी हैं. मैंने सोचा, मेरी उम्र वो सब करने नहीं पर हिमालय की चोटियों की पृष्ठभूमि में घने जंगलों के बीच से गुजरती सडक पर योगा तो किया ही जा सकता अहै :) और मैंने कई योग मुद्रा में फोटो खिंचवा लीं. जब बिलकुल ही अँधेरा हो गया तो ड्राइवर आकर हमें वापस होटल ले गया. हमें एक घर के अहाते में नाशपाती से लदा एक बहुत बड़ा पेड़ मिला. नाशपाती के पेड़ देखने का भी मेरा पहला अवसर था.सेब के पेड़ तो हर गली कुचे में थे .
हिमाचल में मैंने एक चीज़ गौर की.वहां बहुत शराब पीते हैं लोग .अब शायद निठल्लापन भी इसकी वजह हो.पहाड़ों पर बहुत सुस्त जीवन है और ढेर सारा वक्त है .हर जगह सडक के किनारे खाली बोतल पड़े हुए मिले. एक छोटे से टीले पर चढ़कर हमने फोटो लेने की सोची ,पर चढने के बाद देखा, एक पत्थर की आड़ में दो लोग शराब पी रहे हैं, हम झट से उतर गए.

अगले दिन नाश्ते के बाद अब हम 'टाबो' के लिए निकल पड़े.  अब तक बहुत ही ख़ूबसूरत रास्ते मिल रहे थे .दोनों  तरफ सेब के पेड़, ढेर सारी हरियाली और कलकल बहती नदी.पर अब डेजर्ट माउन्टेन' यानि पहाड़ों का रेगिस्तान शुरू हो गया था . सडक भी बहुत खराब थी. ज्यादातर धूल और पत्थर भरी कच्ची सडक और बहुत ही पतली ,पहाड़ के किनारे बस एक गाड़ी चलने भर जगह. गाड़ी का एक तरफ का पहिया बिलकुल रास्ते के किनारे होता और नीचे गहरी खाई . गाड़ी की स्पीड बीस-तीस से ज्यादा नहीं होती . कहीं कहीं नदी मिलती भी तो बिलकुल मटमैले पानी वाली उफनती हुई। यह विश्व का सबसे लहटरनाक रास्ता है।यू ट्यूब पर कई वीडियो हैं।देखकर कलेजा मुँह को आ जाता है और विश्वास नहीं होता
इन्हीं रास्तों पर हम भी चलकर गए है . हमारे साथ ही एक गाड़ी और थी जिसमें तीन लडकियां और एक लड़का था . ये लोग भी हमारी तरह ही लाहुल स्पीती ट्रिप पर थे.दोनों ड्राइवर की दोस्ती हो गई थी और दोनों एक ही जगह चाय पानी के लिए गाड़ी रोकते. इस इलाके में हर होटल के सामने हमें  'थुक्पा ' लिखा हुआ दिखता .यहाँ की लोकल डिश है. हमने एक जगह ऑर्डर की .पतले से सूप में नूडल्स थे ,कुछ बारीक कटी सब्जियां डली थीं .हमें तो स्वाद पसंद नहीं आया . उस रेस्टोरेंट को दो बहनें चला रही थीं ,बड़े इसरार से हमें खिला रही थीं पर हमसे पूरा खत्म नहीं हुआ. हिमाचल में ज्यादातर स्त्रियाँ दुकानदार ही दिखीं. टाबो जाने के लिए हमें एक पहाड़ के ऊपर जाकर फिर दूसरी तरफ नीचे उतरना था .पहाड़ पर गोल गोल गाड़ी चढ़ते देख रोमांच हो रहा था. ऊपर हवाएं खूब ठंढी हुई जा रही थीं और बादल जैसे राह रोक ले रहे थे. करीब 12,014 फीट की उंचाई पर एक गाव 'नाको 'स्थित है. . नाको में हमने गरमागरम राजमा और चावल खाया ..इतनी ऊँचाई पर ऐसा खाना खाकर मजा आ गया . कुछ ही देर में रेस्टोरेंट कहकहों से गुलज़ार हो गया. किसी  शादी से लौटते हुए एक ग्रुप आया. सब रिश्तेदार बहुत चहक रहे थे . एक जैसे जेवर और हिम्ह्क्ली टोपी पहने स्त्रियाँ बहुत सुंदर लग रही थीं. दूसरी कार वाले लोग 'नाको' में ही रुक कर अगले दिन 'टाबो' पहुँचने वाले थे. उनका ट्रिप तेरह दिन का था जबकि हमार ग्यारह दिन का. नाको झील बहुत खूबसूरत है ,जिसे देखने से हम वंचित रह गए . पहाड़ पर से उतरते हुए मन बड़ा उदास हो गया. 
कल्पा
'टाबो' पहुँचते हमें शाम हो गई. टाबो 10,760 फीट की ऊँचाई पर स्थित है. इसलिए यहाँ अन्धेरा 8.15 के बाद ही होता है. ये एक छोटा सा गाँव है. होटल पहुंच कर हमने बालकनी से एक अद्भुत नज़ारा देखा . आसमान में चाँद टंगा हुआ था , पहाड़ों के नीचे अंधेरा उतर आया था पर ऊपर के हिस्से सूरज की  रौशनी में नहाये हुए थे .यानि एक ही फ्रेम में चाँद, सूरज की  रौशनी और अंधेरा सब थे :) .पता चला हज़ार वर्ष पुरानी मॉनेस्ट्री बिलकुल पांच मिनट की दूरी पर है . पतली गलियों से होते हुए हम 996 में स्थापित भव्य मॉनेस्ट्री द्वार तक पहुँच गए. यह स्पीती नदी के किनारे स्थित है. इसकी भव्यता और शांति अभिभूत कर देती है.  1996 में दलाई लामा ने यहाँ 'कालचक्र समारोह' का आयोजन किया था जिसमें दुनिया भर से बौध्द भिक्षु आये थे . अन्धेरा हो गया था ,इलिए उनलोगों ने कमरे नहीं खोले .हमें अगले दिन सुबह आने के लिए कहा .हम बाहर स यही घूम घूम कर मॉनेस्ट्री देखते रहे.मॉनेस्ट्री के पीछे बड़े बड़े  स्तूप बने हुए हैं. हल्के घिरते अंधियारे में एक विदेशी युगल हाथों में हाथ डाले बहुत गंभीरता से कुछ बातें करते टहल रहा था. एक झाडी पर कई सारी गौरय्या चहचहा रही थीं, घड़ी देखी साढ़े सात बज गए थे ,पर पर्याप्त उजाला था . काफी देर तक मॉनेस्ट्री की दिव्य शांति की अनुभूति ले हम लौट पड़े. संकरे रास्ते पर मोबाइल का टॉर्च जलाना चाहा पर जरूरत नहीं थी. चटख चांदनी बिछी हुई थी .

होटल में हमारे बगल वाले कमरे में दो लडके ठहरे हुए थे .डिनर के वक्त देखा वे हाथ से दाल चावल खा रहे हैं .मुझे लगा वे जरूर बिहार के होंगें.पर बात की तो पता चला, वे दक्षिण के हैं. दक्षिण में भी लोग हाथों से ही दाल-चावल खाते हैं. दोनों लडके एक महीने की छुट्टी लेकर बैंगलोर से अपनी बाईक पर निकल पड़े हैं. उन्होंने अपनी यात्रा की कोई रूपरेखा नहीं बनाई थी .जहाँ मन हो जाता रुक जाते . रोहतांग से वे लद्दाख की तरफ निकल जाने वाले थे . 
टाबो

अगले दिन सुबह हम फिर मॉनेस्ट्री में हाज़िर थे . आज उन्होंने सारे कमरे खोल कर दिखाए . मॉनेस्ट्री की भीतरी दीवारों पर बुद्ध के जीवन से संबंधित भव्य विशाल पेंटिंग्स लगी हुई थीं.जो सिल्क के कपड़ों पर की हुई है, पर उनका रंग वैसा ही बना हुआ  है.छत भी पेंटिंग से ढके हुए थे. उन सबको निरखते एक दिव्य अनुभूति हो रही थी. वहाँ से हमने कुछ सुवेनियर्स खरीदे. एक सुंदर सी महिला की  दूकान थी. वहाँ हमने एक प्रेयर बाउल खरीदा . ये एक बड़ा सा कटोरा होता है, जिसकी बाहरी सतह पर लकड़ी का एक छोटा सा स्टिक धीरे धीरे फिराने से बहुत ही मधुर ध्वनि उत्पन्न होती है. इन ध्वनि की तरंगों पर ध्यान लगाते हैं . हमने भी कर  के देखा और उस मधुर संगीत पर मुग्ध हो गए .पर जब मुंबई वापस आकर वही क्रिया दुहराई तो बड़ी क्षीण सी आवाज़ निकली . हमें लगा हमने ठीक से नहीं किया पर बार बार लकड़ी फिराने के बाद भी टाबो जैसी गूंजती आवाज़ नहीं निकली तब ध्यान आया .वह हिमालय की गोद में बसा एक छोटा सा शांत गाँव था . फिजां बिलकुल शांत थी, कहीं कोई शोर नहीं. मुम्बई में खिड़की दरवाजे बंद करने के बाद भी वातावरण में इतना शोर घुला हुआ है कि उतनी मधुर ध्वनि सुनाई पड़ ही नहीं सकती . पर अब यही मधुर दवानी बहुत प्यारी लगती है ,टाबो वाली ध्वनि हम भूल चुके हैं :)


कल्पा


हू-बू-लान-कार  मॉनेस्ट्री' 


नारायण नागिनी मन्दिर' 







मन्दिर के चांदी मढ़े दरवाजे 












कल्पा से नाको के बीच 








नाको का रेस्टोरेंट 



 टाबो मॉनेस्ट्री 







प्रेयर बाउल 


Monday, July 31, 2017

लाहुल स्पीती यात्रा वृत्तांत -- 2 (सराहन, सांगला, चितकुल )

नारकंडा से हम सुबह दस के करीब ,सराहन  की तरफ चले .रास्ता बहुत ही खूबसूरत  था ,पतली घुमावदार सडकें, ढेर सारी हरियाली के बीच सेब के बाग़ . मैंने पहली बार पेड़ों पर लगे सेब को देखा . सेब के पेड़ तो देखे थे पर सेबों के मौसम में कभी हिमाचल आना नहीं हुआ था . गुच्छे में लटके लाल लाल सेबों को देखकर  मैं तो जैसे पागल हुई जा रही थी. एक जगह मैंने गाड़ी रुकवाई और फोटो खींचने के लिए उतर पड़ी. मेरा उत्साह देख सब डर गए कि मैं कोई सेब तोड़ ना लूँ, पर बिना पूछे कैसे हाथ लगा सकती थी .अक्ल घर थोड़े ही भूल आई थी, साथ लेकर चल रही थी :)  .लिहाजा पेड़ों के सामने ढेर सारे फोटो खिंचवाए .कई जगह  सतलज नदी भी संग संग चली और उसका कल कल करता  मधुर स्वर...सफर को संगीतमय बना रहा था . तीन बजे के करीब हमलोग सराहन पहुँच गए .
सराहन हिमाचल का एक छोटा सा गाँव है .इसे किन्नौर का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है. यह शिमला से १६५ और नारकंडा से  100 किलोमीटर की दूरी पर   समुद्र तल से लगभग 7100 फुट की उंचाई पर स्थित है. पहले यह 'बुशहर रियासत 'की  राजधानी था .शायद कठिन भोगोलिक परिस्थितिओं को देखते हुए बाद में राजा राम सिंह ने रामपुर को बुशहर की राजधानी के रूप में विकसित किया और अंतिम राजा के रूप में श्री वीरभद्र सिंह जी ने इसका प्रतिनिधित्व किया.  हिमाचल के लोग उन्हें आज भी राजा साहब कह कर बुलाना पसंद करते हैं.
सराहन के बारे में एक पौराणिक कथा के अनुसार यह स्थान कभी शोणितपुर कहलाता था. और यहाँ का सम्राट बाणासुर था, जो राजा बलि का पुत्र था. वह भगवान् भोले शंकर का परम भक्त था. “ त्रेता युग में रावण और बाणासुर के बीच में काफी संघर्ष होता रहा है, उस वक़्त बाणासुर ही एक अकेला ऐसा योधा था, जिससे रावण कभी जीत नहीं सका”. 


होटल में सामान रख कर खाना खाया और यूँ ही भटकने निकल गए . एक छोटे कस्बे के बाज़ार सा था जहां जरूरत की सारी चीज़ें मिल रही थीं .स्कूल  यूनिफ़ॉर्म में बच्चे स्कूल से लौट रहे थे . स्कोल कि इमारत भी बड़ी सी थी. कुछ बच्चों से रोक कर स्कूल के विषय में बात की तो पता चला, अच्छी पढ़ाई होती है और  सारे विषयों के शिक्षक भी हैं . छोटे से कस्बे के हिसाब से अच्छी खबर थी. हिमाचल में शिक्षा  का स्तर अच्छा दिखा और जितने भी लोगों से मिली , स्त्री-पुरुष, सभी बारहवीं  पास जरूर थे .
दूसरे दिन सुबह तैयार हो हम भीमकाली मंदिर देखने निकल पड़े.
सराहन का भीमाकाली मंदिर बहुत प्रसिद्ध है. दूर दूर से लोग भीमा देवी के दर्शन करने आते हैं और मन्नतें माँगते हैं . 'बुशहर राजवंश' की ये कुलदेवी हैं .आज भी विजयादशमी के समय वीरभद्र सिंह यहाँ पूजा करने आते हैं. यह मंदिर राजाओं के महल के अंदर स्थापित था और उनका निजी मंदिर था पर अब यहाँ सार्वजनिक स्थान है. यह मंदिर सब तरफ से सेबों के बाग़ से घिरा हुआ  है.पर्वत शिखर श्रीखंड की  पृष्ठभूमि में यह बहुत ही मनमोहक लगता है. 
यह ५१ शक्तिपीठों में से एक है .कहते हैं शिव जी जब सती का शव कंधे पर लेकर तांडव नृत्य कर रहे थे तो सती का कान यहाँ गिरा था और भीमाकाली देवी प्रगट हुई थीं. मन्दिर के  दो भव्य भवन है . एक का जीर्णोद्धार  किया गया है और एक अपेक्षाकृत नया है. 
 हिंदू और बौद्ध वास्तुशिल्प से निर्मित यह मंदिर लगभग 2,000 वर्ष पुराना है, मगर इसका जीर्णोद्धार कर इसको पुनः वही आकार दिया गया है। पत्थरों और लकड़ी के इस्तेमाल से बना यह मंदिर शत-प्रतिशत भूकंपरोधी है। मंदिर के प्रांगण में खड़े होकर आप हिमालय को साक्षात निहार सकते हैं।  यह मंदिर अपनी विशिष्ट निर्माण शैली, लकड़ी की कलात्मक नक्काशी, और चांदी  चढ़े दरवाजों के लिए विख्यात है. उलटे पिरामिड की शक्ल में बने इस मन्दिर का नीचे बना आधार छोटा है, पहली मंजिल बड़ी और दूसरी मंजिल पहले से भी बड़ी है.,जिसके ऊपर छत्र है . मुख्य मन्दिर भी दुरी मंजिल पर ही है. मन्दिर निर्माण की एक और विशिष्टता यह है कि यहाँ लकड़ी के स्लीपर तथा पत्त्थर की  सिलें एक एक ऊपर एक रखकर मुख्य दीवारें  बनाई गई है. ये दीवारें और ढलवां छत बौद्ध प्रभाव को दर्शाती हैं. निर्माण की इस विशिष्टता के कारण यह गर्मी सर्दी आसानी से शसन कर लेती हैं. अनुमानतः यह सातवीं, आठवीं, शताब्दी में बना था .. इस से पता चलता है कि उस समय तिब्बत के साथ भारत का व्यापार शुरू हो चुका था . लकड़ी और पत्थर से बनी दीवारें हैं और छत काफी नीची है. 
  

मन्दिर का बाहरी दृश्य भी  मंत्रमुग्ध कर देने वाला है. यह मन्दिर बहुत बड़े भाग में फैला हुआ है. मुख्य मन्दिर तक जाने में बड़े बड़े तीन आंगन पार करने पड़ते हैं .जहां देवी शक्ति के तीन अलग अलग रूपों की मूर्ति मन्दिर में स्थापित है. देवी भीमा की अष्टधातु से बनी अष्टभुजा वाली मूर्ति सबसे ऊपर वाले प्रांगण में है. पैगोडा आकार के छत वाली इस मंदिर में पहाड़ी शिल्पकारी के बहुत सुंदर नमूने देखने को मिलते हैं.दीवारों पर लकड़ी के ऊपर देवी देवताओं, फूल पत्तीकी सुंदर नक्काशी है. मंदिर के प्रांगण में जाने वाले बड़े बड़े दरवाजों से गुजरना होता है उनपर चांदी मढ़ी हुई थी . 
मंदिर के अंदर स्त्री या पुरुष बिना सर ढके नहीं जा सकते .गार्ड उन्हें एक हिमाचली टोपी पहनने के लिए देता है. चमड़े की  बनी कोई वस्तु बेल्ट या पर्स भी लेकर नहीं जा सकते . इन्हें रखने के लिए बाहर लॉकर बने हुए हैं. हैरानी की बात ये लगी कि लॉकर के पास ही ,ताले चाबी भी रखे थे . लॉकर में अपना समान रखो और ताला लगाकर चाबी जेब में डाल कर ले जाओ. कहने में शर्म आ रही है पर अपना उत्तर भारत होता तो ताले-चाबी कब के चोरी हो गए होते . यहाँ ट्रेन के टॉयलेट में मग और बैंक,ऑफिस  वगैरह में पेन भी जंजीर में बंधी होती है :( 
पुरानी मन्दिर वाले प्रांगण में बहुत बड़े घड़े और कडाही पर्यटकों के दर्शनार्थ रखे गए हैं. हमने भी उनके संग कुछ  फोटो खिंचवाए .
सराहन का पक्षी विहार भी मशहूर है.हम वहाँ गए भी पर पता चला आजकल बंद है वह पक्षियों का प्रजनन काल है, उस वक्त पर्यटकों की आवाजाही से वे डिस्टर्ब  हो सकते हैं.. सही है,पक्षी हैं तो क्या,उन्हें भी आराम और  प्राइवेसी चाहिए ही. . वहीँ पर कुछ खूबसूरत मजदूर औरतें किसी भवन निर्माण में काम कर रही थीं और सुस्ताने के लिए रेत पर बैठी थीं. मुझे इतनी प्यारी लगीं कि मैंने उनकी तस्वीर ले ली .
सराहन में कई बौद्ध मठ भी हैं . एक मठ के प्रांगण में गए तो पाया, मठ बंद था .पर वहां मेरे मन  की मुराद पूरी हो गई. मठ कुछ उंचाई पर था उस से लगा हुआ कुछ नीचे एक सेब का बाग़ था .सेब से लदे डाल,मठ के प्रांगण में झूल रहे थे .पहले तो मैंने उन्हें तोड़ने की एक्टिंग करती  हुई तस्वीरें खिंचवाई. वहीँ दो तीन औरतें बैठी हुई थीं .वे मेरा कौतूहल  देख ,मुस्करा रही थीं.पता चला उनका ही बाग़ है और मैंने उनसे आग्रह किया, 'एक सेब तोड़ लूँ '.उन्होंने हंसते हुए इजाज़त दे दी...'एक क्या दो चार तोड़ लो'.पर मैंने दो ही तोड़े  .सेब अभी खट्टे ही थे पर इतने रसभरे और क्रंची कि मजा आ गया.

एक बहुत ही भव्य मठ एक पहाड़ी  के ऊपर बना हुआ था .वहाँ बुद्ध की विशालकाय मूर्ति थी .ऊपर से देखने से धुंध में लिपटा पूरा सराहन दिख रहा था . एक बौद्ध भिक्षु ने कतार से चमचमाते दीयों में दिया और बत्ती सजा रखी थी. पीतल के कई दीप स्तम्भ भी थे, जो सब चमचमा रहे थे . निश्चय ही वो बौद्ध  भिक्षु बहुत ही श्रद्धा लगन से अपना काम करता था . मठ के नीचे एक सेब का पेड़ दिख रहा था , जो फलों से इतना ज्यादा लदा हुआ   था कि उसकी पत्तियाँ भी नजर नहीं आ रही थीं. लौटते हुए हमें पानी बहने का स्वर तो सुनाई दे रहा था पर कहीं कोई धारा दिखाई नहीं दे रही थी....आवाज़ का पीछा करते रहे तो पाया...पत्थरों के नीचे से एक पतला सा झरना बह रहा था .इतनी बड़ी बड़ी शिलाएं भी उसकी आवाज़ नहीं दबा पा रही थीं ( हम स्त्रियों की आवाज़ सी :) ) 


अब शाम होने को आई थी...हम होटल लौट आये .दुसरे दिन सांगला के लिए प्रस्थान करना था .
'सांगला' हिमाचल प्रदेश के किन्नौर जिले में स्थित एक सुरम्य पहाड़ी शहर है। भारत-चीन सीमा पर अपनी स्थिति की वजह से 1989 तक इस स्थान के दौरे के लिये, यात्रियों को भारत सरकार से एक विशेष अनुमति लेनी पड़ती थी। हालांकि, बाद में इस क्षेत्र में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिये इस नियम को समाप्त कर दिया गया। बस्पा नदी की घाटी में स्थित यह जगह तिब्बती सीमा से काफी निकट है।तिब्बती भाषा में 'सांगला काअर्थ है 'प्रकाश का रास्ता'। इसकी  की प्राकृतिक सुंदरता अद्भुत  है चारों तरफ हिमालय की उंची पहाड़ियों से घिरा और वन, ढलानों और पहाड़ों से छाया हुआ है।यहाँ सेब, खुबानी, अखरोट, देवदार के वृक्ष बहुतायत में हैं. बताया जाता है कि प्राचीन समय में यह घाटी वनों और प्राकृतिक सम्पदा से इतनी ज्यदा घनी थी कि अग्यात्वास के दौरान ,पांडव यहीं छुपे  थे .  
इन पहाड़ी रास्तों पर कहीं कोई होटल या ढाबा नहीं मिलता कि रुक कर कुछ खाया पिया जाए. हमें बेतहाशा भूख लग गई थी. जब होटल पहुंच कर खाना ऑर्डर करने के लिए बुलाया तो उसने पूछा, 'आप जो कहें वही बना देंगे , हमें सामान लाने बाज़ार  जाना होगा.' .अगस्त का महीना वहाँ घुमने के लिए बहुत मुफीद मौसम है पर पर्यटकों के लिए ऑफ सीजन है. पर्यटक, गर्मी या दशहरे की छुट्टियों में ही ज्यादातर आते हैं. 
 खाना तैयार होने में वक्त लगने वाला था . हमने कहा, 'हम बाज़ार में जाकर ही कुछ खा लेते हैं, अब आप शाम  को खाना बनाना' . होटल का कुक भी हमारे साथ ही बाज़ार आया .वहाँ एक रस्टोरेंट में दाल रोटी और सब्जी आर्डर की  सब्जी का स्वाद कुछ अजीब सा था , चाइनीज़ जैसा पर पूरी तरह वैसा भी नहीं .लेकिन हमें इतनी भूख लगी थी कि गर्म गर्म फुलके के साथ वो सब्जी भी स्वादिष्ट लगी . पास की टेबल पर एक कपल बैठा था . वो हमारे होटल में नहीं ठहरा  पर शायद  उनके होटल में भी खाना नहीं बना था. वे लोग भी दाल रोटी सब्जी खा रहे थे .वहाँ वाशबेसिन पर गजब जुगाड़ दिखा. एक बड़े से प्लास्टिक डब्बे में नल लगा हुआ  था और वही डब्बा वाश बेसिन के ऊपर टंगा था . 
होटल में पहुंचे तो पीछे की तरफ एक अद्भुत दृश्य दिखा . हमारे होटल और पहाड़ियों के बीच एक इन्द्र्धनुष तना हुआ था . इतने करीब से इन्द्रधनुष पहली बार देख रही थी, हमने इन्द्रधनुष के साथ एक सेल्फी  ले ली :) खिड़की से दिखता दृश्य बचपन में बनाई पेंटिंग सरीखा लग रहा था .बर्फ से लदी चोटिया ,पहाड़ों के ढलान पर देवदार के वृक्ष ,उसके ऊपर मखमल सा बिछा हरा चारागाह और नीचे बहती बलखाती चंचल  नदी ...नदी के किनारे फलों से लदे सेब के बाग़ .नदी की कलकल धरा का मधुर संगीत हमें यहान तक सुनाई दे रहा था .बहुत देर तक  हम उन दृश्यों में खोये रहे . फिर ख्याल आया नदी तक घूम आया जाए .   नदी के किनारे ढलान पर एक गाँव बसा हुआ था . हम पूछते पाछते चल दिए ,.रास्ते में कई महिलायें पत्तों का बड़ा सा बोझा लादे ,घर की तरफ लौट रही थीं. . वे सर्दी के मौसम के लिए पशुओं का चारा इकठा करके रख  रही थीं.लाल लाल गालों वाली सुंदर पतली छरहरी महिलायें ,तेजी से इधर उधर काम से आ जा रही थीं. एक से रुक  र्मैने कुछ बात की तो वो पूछने लगी, कहाँ से आई हैं? और बम्बई कहने पर उसकी आँखें चमक उठीं, फिर उसने पूछा, '...कैसा लगा हमारा देस?" मेरे  'बहुत अच्छा ' कहने पर मुस्करा कर बड़ी मीठी आवाज़ में बोली, ;"फिर आना' . अनजान लोगों को भी अपने देस फिर फिर आने का न्योता, ये पहाड़ों के निश्छल लोग ही दे सकते हैं. 
थोडा नीचे जाने पर ,नाग देवता का बहुत सुंदर मन्दिर मिला . उसके द्वार पर बड़े बड़े नागों की आकृति बनी हुई थी. वहाँ लिखा था ,'पारम्परिक वेशभूष में ही मंदिर के अंदर प्रवेश करें' .वैसे भी मंदिर बंद था . उस प्रांगण में ऐसे चार मंदिर थे ....कुछ लड़के लडकियाँ ,मन्दिर के प्रांगण में इक्खट दुक्खट खेल रहे थे . पूरे देश में ही लडकियां इसे खेलती हैं . खेलने के लिए बस थोड़ी सी जगह और एक पत्थर का टुकड़ा ही  तो चाहिए . शाम गहराने लगी थी , होटल से इतनी पास  दिखती नदी अब भी दूर नजर आ रही थी. और हम सोच रहे थे, जितना नीचे उतरते जायेंगे, वापस चढना भी पड़ेगा.सो लौट पड़े. एक छोटी सी दूकान में चाय पी और समोसे को याद करते  हुए मोमोज खाए .यहाँ समोसे चाट पकौड़ी की जगह बस मोमोज ही मिलते थे, जो मुझे नहीं पसंद :( (नॉनवेज खाने  वाले कहते हैं , वेज मोमोज अच्छेनहीं होते, नौन्वेज ज्यादा स्वादिष्ट होते हैं , अब  अहम शाकाहारियों को ये कैसे पता चलेगा )
दूसरे दिन हमें भारत-तिब्बत  की सीमा पर बसे अंतिम गाँव 'चिट्कुल' के लिए निकलना था. चितकुल बस्पा नदी के किनारे बसा बहुत ही खूबसूरत छोटा सा गाँव है. सांगला से २८ किलोमीटर की दूरी पर है. सांगला से चितकुल का रास्ता इतना खूबसूरत है कि आज भी आँखें बंद करती हूँ तो सारे दृश्य साकार हो उठते हैं. यह पूरा रास्ता फैले हुए जंगल के बीच से होकर गुजरता है.रास्ते के ,पार्श्व में बहती बसपा नदी...पिघलते ग्लेशियर की छोटी छोटी धाराएं, आस-पास पड़े बड़े बड़े सफेद गोल पत्थर, तरह तरह के घने हरे पेड़, दूर चमकती बर्फीली चोटियाँ रास्ते को नयनाभिराम बना देती हैं.  महसूस होता है , स्वर्ग अगर कहीं है तो ऐसा ही होगा..हर तरफ हरियाली से भरा यह क्षेत्र ,भोजपत्र के घने जंगलों के लिए विख्यात है. कभी भोजपत्र का उपयोग कागज़ की तरह किया जाता था ,हमारे ऋषि मुनियों ने भोजपत्र पर ही कई महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की है. भोजपत्र, टिम्बरलाइन (समुद्रतल से ३३०० मीटर की ऊँचाई ) से ऊपर उगने वाल दुर्लभ वृक्षों में से एक है. इसका जंगल हज़ारों वर्षों में पनपता है. 
बीच में एक पुल पार करना पड़ा और हम पुल से उतरकर नदी तक जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाए . दूर से बहती हुई, पत्थरों से टकराती नदी की धारा बहुत तेज थी .एक पत्थर पर बैठ जैसे ही धारा में पैर डाला तो अगले ही पल निकाल लेना पड़ा...लगा पैर सुन्न हो जायेंगे...इतना बर्फीला,ठंढा पानी था .
 में लकड़ियों से बने हुए बहुत छोटे छोटे एक दुसरे से लगे हुए घर थे .बीच में एक बड़ा सा नाला बह रहा था .उस नाले का पानी इतना साफ़ था कि मैंने उसकी भी एक तस्वीर ले ली .गाँव  के किनारे खेतों में सरसों भी फूली हुई थी और एक पति पत्नी मिलकर खेत में कम कर रहे थे . एक घर के बाहर चटाइयों पर शलजम, गोभी सूख रहे थे .वहीँ एक बूढ़े सज्जन बैठे थे .पूछने पर बताया कि ये इंतजाम सर्दियों के लिए है. सर्दियों में इनका ही सूप बनाकर पीते हैं. गाँव के बीच में थोड़ी सी खाली जगह पर पड़ी एक लाल बेंच बहुत खूबसूरत लग रही थी . मन हुआ देर तक वहाँ बैठी रह जाऊं. चितकुल में आलू के बहुत उत्कृष्ट किस्म की अच्छी खेती होती है . दुनिया भर में यहाँ के आलू मशहूर हैं,क्योंकि यहां उगाये आलू को दुनिया में सबसे अच्छा माना जाता है और यह काफी महंगा भी है।

यहाँ एक स्थानीय देवी चिटकुल माथी का सुंदर मंदिर है, जो गांव के मूल निवासियों द्वारा माता देवी के रूप में भी जाना जाता है। हिंदू देवी गंगोत्री को समर्पित है,  .पर दोपहर के वक्त मंदिर बंद था ,हमने बाहर से ही दर्शन कर लिए. यहाँ बौद्ध मठ भी हैं .
वहाँ एक वॉलीबॉल कोर्ट भी था , जहां कुछ युवा  वॉलीबॉल खेल रहे थे .पास ही बहुत सारे बुजुर्ग, बैठे कोई मीटिंग कर रहे थे . चिट्कुल में दसवीं तक का एक स्कूल भी है और गाँव का हर कोई साक्षर है. सुदूर सीमा का अंतिम गाँव  जरूर है पर सारी आधुनिक सुविधाएं वहाँ पहुँच चुकी थी .घरों के ऊपर डिश एंटेना लगे हुए थे .पास की दूकान में पेप्सी, बिस्किट, चिप्स सब कुछ मिल रहा था .हमने भी वहाँ बैठ चिप्स के साथ अदरक इलायची वाली स्वादिष्ट चाय पी. 
उन्हीं खूबसूरत रास्तों को आँखों में भरते हम वापस हो लिए . होटल में खाना खा कर ,'कामरू किला' देखने चल पड़े.कामरू किला अब एक हिंदू देवी कामाक्षी को समर्पित मंदिर में बदल गया है. पहले यहाँ  राजा रहते थे . यह काफी ऊँची एक पहाड़ी पर स्थित है. पर सीढियां बनी हुई हैं क्यूंकि पूरे पहाड़ पर घर बने हुए हैं और लोग बसे हुए हैं . रस्ते में सेब के पेड़ भी हैं और कई जगह सीढियों पर पेड़ की डाल से मेहराब सा बना हुआ है ,जिसपर हरे-लाल सेब बन्दनवार से सजे थे . सेबों की दीवानी मैंने उनके नीचे खड़े होकर भी एक तस्वीर खिंचवा ली :) 
हम चढ़ते जा रहे थे ,पर सीढियां खत्म होने का  नाम  ही नहीं ले रही थीं. पर शिकायत करते शर्म आ रही थी क्यूंकि लगातार लोग सीढियों से ऊपर जा रहे थे . एक बहुत बूढी महिला भी सीढ़ी चढ़ रही थीं. कुछ मजदूर पीठ पर दस -पन्द्रह ईंट एक थैले में बांधकर ऊपर चढ़  रहे थे और जाने कितने फेरे लगाते होंगे वे. 
पूरी हिमाचल यात्रा के दौरान मैंने एक भी किसी स्थानीय मोटे स्त्री-पुरुष को नहीं देखा . पहाड़ों के ऊपर चढने का अभ्यास अतिरिक्त चर्बी कहाँ जमने देगा . ऊपर चढने के बाद पाया किले का विशालकाय दरवाजा बंद था और उसपर मोटा ताला जड़ा हुआ था .पर निराशा में डूबनेसे बेहतर  हमने सोचा किले के पीछे बसा गांव ही घूम आयें .कुछ युवा वहाँ बैडमिन्टन  खेल रहे थे .पूछने पर बताया कि पुजारी किसी काम से नीचे  गया होगा,थोड़ी देर में आ जाएगा .हम ऊपर ही इधर उधर घूमते रहे . कई जगह सफेद-काले-भूरे झबरीले कुत्ते पड़े सुस्ता रहे थे  .पहाड़ पर लोग कुत्तों का बहुत ख्याल रखते हैं. सारे कुत्ते बहुत हृष्ट पुष्ट थे. और अच्छी ब्रीड के लग रहे थे. थोड़ी देर बाद लौटे  तो पाया, पुजारी लौट आये थे . उन्होंने अंदर जाने से पहले एक हिमाचली टोपी पहनने के लिए दी और कमर में बाँधने के लिए एक कमरबंद सा दिया . बिना इसके किले में प्रवेश वर्जित था. जब रजिस्टर में अपना नाम लिखने की बारी आई तो पाया ऊपर के सारे नाम विदेशी थे , हॉलैंड , इंग्लैण्ड, ऑस्ट्रेलिया ,जर्मनी, इजरायल आदि से पर्यटक थे. भारतीय नाम भी होंगें जरूर पर रजिस्टर के उस पेज पर नहीं थे .हमने अंदर से किला देखा, जिसमे कभी राजा रहते थे पर अभी वो एक साधारण से घर जैसा ही  लग रहा था .लकड़ी से बने इस किले की  अवस्था बहुत जर्जर थी . अच्छी देखरेख की  सख्त जरूरत है . मंदिर वाला कमरा उसने नहीं खोला ,बताय कि वो विशेष अवसरों पर ही खुलता है. किले के प्रांगण से नीचे पूरा सांगला नजर आ रहा था .यहाँ शाम हो चुकी थी ,पर दूर पहाड़ियों पर अभी भी सूरज की रौशनी चमक रही थी....पहाड़ के नीचे का आधा हिस्सा,अँधेरे में घिरा था  और ऊपर की चोटियाँ सूरज की पीली  रौशनी में दैदीप्यमान  थीं. बहुत ही अनूठा दृश्य था .बाद में तो हर शाम यह नज़ारा देखने को मिला.
नीचे उतरना बिलकुल मुश्किल नहीं लगा . गाड़ी हमने वापस भेज दी और धीरे धीरे टहलते हुए बाज़ार का चक्कर लगाते हुए होटल लौट आये. . होटल में गर्मागर्म खाना तैयार था , बिलकुल तवे से उतारे हुए फुल्के और घर सा बिना ज्यादा तेल -मसाले का खाना. ऑफ सीजन में आने के फायदे :)
अगले दिन हमे कालापा के लिए निकलना था.